ग्वालियर गली-गली में बन रहे गोल्डन टावर, आंखें मूंदकर बैठे जिम्मेदार

ग्वालियर. शहर की बड़ी-पाश कालोनियां हों या फिर घने-संकरे इलाके, गली-गली में गोल्डन टावर जैसी इमारतों का निर्माण धड़ल्ले से किया जा रहा है। शहर में निर्माण के लिए ग्राउंड प्लस दो या तीन एक स्टैंडर्ड मानक है। इसमें भी प्लाट के सामने वाली सड़क की चौड़ाई देखना जरूरी है। इसके बावजूद 10 से 12 फीट चौड़ी सड़क पर तीन से चार मंजिला इमारत तैयार कर दी जाती है। भवन निर्माण की अनुमति यानी कागजों में भले ही सारे नियम-कानून का हवाला दिया जाता है, लेकिन मौके पर इनका पालन सुनिश्चित कराने के बजाय जिम्मेदार अधिकारी आंखें बंद किए बैठ जाते हैं। इसका नतीजा यह है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति फिर से हो सकती है।
नेहरू कालोनी स्थित गोल्डन टावर में पिलर क्षतिग्रस्त होने के कारण 24 परिवारों के सामने संकट खड़ा हो गया है। पिलर क्षतिग्रस्त होने के पीछे भले ही रहवासियों और बिल्डर के अलग-अलग दावे हों, लेकिन हकीकत यह है कि शहर में नियम-कानून को धता बताकर बहुमंजिला इमारतें तैयार करने का एक ट्रेंड चल निकला है, जो खतरनाक साबित हो रहा है। इससे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था से लेकर सफाई और सीवर व्यवस्था तक छिन्न-भिन्न हो जाती है। इसका कारण है कि लोग स्वयं के रहने के लिए भवन निर्माण की अनुमति लेते हैं।
इसमें नक्शा मकान तैयार करने का लगाया जाता है, लेकिन मौके पर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग तान दी जाती है। कायदे से एक मकान में चार से पांच लोगों की रिहाइश मानी जाती है, लेकिन तीन से चार मंजिला इमारत में फ्लैट बनने की स्थिति में उसी जगह पर 20 से 25 लोगों का बोझ आ जाता है। यह स्थिति सड़क से लेकर वाहनों, सीवर लाइनों और पार्किंग तक लागू होती है। इसके अलावा इन इमारतों में निर्माण की गुणवत्ता से लेकर मानकों तक का ध्यान नहीं दिया जाता है। इसका नतीजा यह है कि इस प्रकार की घटनाएं सामने आती हैं।

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