ग्वालियर-चम्बल आज उद्योगविहीन, रोज़गारविहीन, पर्यटनविहीन, आज तक रोपवे का निर्माण नहीं हो पाया – राज बब्बर

ग्वालियर- पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए रोपवे बनाने की बात हुई और तब के महापौर विवेक नारायण शेजवलकर, जो कि अब सांसद हैं, ने एक बार शिलान्यास कर दिया, फिर एक बार और इसी रोपवे को बनाने के लिए शिलान्यास समारोह हो गया । आज तक रोपवे का निर्माण नहीं हो पाया। दो बार इसी तरह शिलान्यास होने और हेडलाइन छपने के बाद भी अब तक रोप-वे नहीं बन सका यानि हर बार भाजपा ने रोपवे के नाम पर ग्वालियर के लोगों के साथ केवल राजनीति की, रोपवे क्यों नहीं बन रहा है। इस सवाल पर कुछ दबी ज़ुबान से जवाब भी आते हैं कि अगर रोप-वे बना तो सिंधिया परिवार की प्राईवेसी पर असर पड़ेगा। बताइये कि क्या सिंधिया परिवार की प्राईवेसी का मेंटेनेंस इतना ज़रूरी है, कि एक परिवार को खुश रखने के लिए पूरे ग्वालियर के टूरिज़म को आसान और आकर्षक बनाने से वंचित कर दिया गया?
ग्वालियर के क़िले पर अमिताभ बच्चन की आवाज़ में क़िले का शानदार इतिहास बताते हुए बड़ा प्रभावशाली लाइट एंड साउंड शो हुआ करता था, जिससे ग्वालियर क़िले की पहचान में चार चाँद लगते थे। आज वो बंद है क्या तथाकथित ‘महाराज’ सारे पर्यटकों को अपने महल के म्यूज़ियम तक सीमित कर देना चाहते हैं? ग्वालियर के क़िले की भव्यता और इतिहास न देखें पर्यटक और अगर लोगों को अपना महल ही दिखाना है, तो उसे राज्यीकृत करिये।
• महल-दुमहले अब पुराने राजाओं के समय होते थे, अब इनका मध्यप्रदेशीकरण करते हुए आम पब्लिक के लिये खोल दिया जाना चाहिये। ये इसलिये भी ज़रूरी है ग्वालियर स्मार्ट सिटी केवल महल के आसपास ही बनी हुई दिखती है, तो पब्लिक प्रॉपर्टी ही हुई. इसलिये इसे पब्लिक के लिए पूरी तरह उपलब्ध होना चाहिये।
यहां के जो पुराने महत्वपूर्ण इंडस्ट्रियल एरिया थे जैसे बामोर और मालनपुर, आज वहां पर जो इंडस्ट्री हैं, वे लगभग बंद होने की कगार पर हैं। नया कोई भी इंडस्ट्रियल एरिया विकसित नहीं हुआ है।  बाराघाटा इंडस्ट्रीयल एरिया विकसित करने का वायदा जुमला साबित हुआ। बिलौआ में स्टील प्लांट के नाम पर केवल हेडलाइन मैनेजमेंट और मीडिया में ब्रांडिंग ही हुई। ऐसे ही बिलौआ में 2020 के अंत तक एक प्लास्टिक पार्क बनकर तैयार हो जाना था, जिस से इस ग्वालियर, डबरा, बिलौआ, आंतरी समेत आसपास के क्षेत्रों के करीब 3 से 4 हजार लोगों को रोजगार मिलता और करीब 1 हजार लोगों को अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से रोजगार के साधन मिलते, लेकिन वह भी केवल जुमला ही साबित हुआ।
श्योपुर
• पिछले साल बड़े ढोल – तमाशे के साथ श्योपुर के कूनो अभयारण्य में अफ़्रीका से भारतीय वायु सेना के विमानों द्वारा चीते लाए गये थे। तब भाजपा सरकार ने मीडिया ब्रांडिंग पर देश की टैक्स पेयर जनता के हज़ारों करोड़ रुपये खर्च कर डाले थे, लेकिन एक साल के भीतर 9 चीतों की मौत से तो यही साबित होता है कि भाजपा किसी भी धरोहर को सहेज नहीं सकती, हर बात का अंतिम लक्ष्य केवल हेडलाइन ।
• शिवपुरी में पर्यटन-केंद्र बनने की हर पात्रता है, ऐतिहासिक धरोहरों से लेकर हरीतिमा से आच्छादित वन सम्पदा भी, लेकिन बजाय एक टूरिज़म-हब बनने के बजाय ये क्षेत्र खनन माफिया (पत्थर और रेत के) का केंद्र बन कर रह गया! इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? पर्यटक माधव राष्ट्रीय उद्यान में खूब आये। लेकिन यहाँ के माधव राष्ट्रीय उद्यान के टाईग़र प्रोजेक्ट में केवल बाघ आ पाये, अरसे से प्रतीक्षित बाघिन अब तक नहीं आई।
मुरैना
• चम्बल की विश्व प्रसिद्ध घड़ियाल सेंचुरी, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र थी, आज भाजपा सरकार और नेताओं के द्वारा संरक्षित अवैध रेतखनन माफिया के चलते पर्यटकों की उदासीनता और अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है।

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