मांढरे वाली माता सिंधिया राज परिवार की कुलदेवी हैं, पैलेस की खिड़की से होते थे दर्शन
ग्वालियर. कैंसर पहाडि़या पर विराजमान मांढरे वाली माता का दरबार लगभग 150 वर्षो से शहरवासी श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बना हुआ है। नवरात्र में यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है। अष्टभुजा मां काली के दर्शन का श्रद्धालु परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिर का इतिहास सिंधिया राजघराने से जुड़ा हुआ है। कभी घने जंगल के बीच स्थित इस मंदिर के आसपास जंगली जानवरों की आवाजाही रहती थी। आज पहाडि़या पर आबादी बढ़ गयी है। ऊंची इमारतें खड़ी हो गयी है। लेकिन माता के प्रति भक्तों की आस्था आज भी उतनी ही गहरी है।
जयविलास पैलेस की खिड़की से दर्शन करते हैं राजपरिवार के सदस्य
मांढरे वाली माता मंदिर और सिंधिया राज परिवार का पुराना संबंध रहा है। मंदिर जयविलास पैलेस के लगभग एक किमी दूर है। ऐसी मान्यता है कि पहले सिंधिया राजघराने के सदस्य महल की एक विशेष खिड़की से माता के दर्शन किया करते थे। मंदिर के पुजारी अशोकराव मांढरे बताते है कि आसपास ऊंची बिल्डिंगें बन जाने की वजह से अब जयविलास से मंदिर दिखाई नहीं देता है। पुजारी के अनुसार मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा 5वीं पीढ़ी निभा रही है। सिंधिया राजघराने की कुलदेवी होने की वजह से अष्टमी, नवमी और दशहरे पर राजपरिवार के सदस्य अलग-अलग दिनों में माता के दर्शन करने के लिये पहुंचते है।
महाराष्ट्र से ग्वालियर आईं माता
मंदिर की स्थापना सिंधिया राजवंश के कर्नल आनंद राव मांढरे ने कराई थी। वे महाराष्ट्र के सतारा स्थित मांढरे वाली माता के परम भक्त थे। मान्यता है कि ग्वालियर आने के बाद माता ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और उचित स्थान पर अपनी प्राण-प्रतिष्ठा कराने का आदेश दिया। इसके बाद तत्कालीन महाराजा सिंधिया के सहयोग से कैंसर पहाड़िया पर मंदिर स्थापित कराया गया। यहां विराजमान अष्टभुजा मां काली की प्रतिमा श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता जरूर पूरी करती हैं।
