हाईकोर्ट का कैबिनेट को दिया आदेश-अधिकारियों के अडि़यल रवैये से परेशान तृतीय-चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी-जांच करें
इन्दौर. ऐसा केस नहीं आया है, जिसमें प्रथम-द्वितीय श्रेणी अधिकारी वेतन-पदोन्नति के मामले को लेकर कोर्ट पहुंचे, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य मंत्रीमण्डल से सवाल किया है कि उच्च अधिकारियों के गलत और अडियल रवैये की वजह से तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का उत्पीड़न क्यों हो रहा है। प्रायः देखने में जैसे दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों नियमित वेतनमान के तहत छठा वेतनमान का लाभ मिल रहा है और सातवें वेतनमान के लाभ के लिये हाईकोर्ट मामलें विचाराधाीन है तो कई मामले में हाईकोर्ट ने सातवें वेतनमान देने के आदेश दिये गये है। हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच के निर्देश दिये है। प्रशासनिक जज विवेक रूसिया और जस्टिस गजेन्द्र सिंह की खंडपीठ ने कहा है कि हमारे सामने कई मामले आये है। जिनमें विभिन्न विभागों के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, वरिष्ठ अधिकारियों के फैसलों से प्रभावित हुए हैं।
अधिकतर मामलों मे बढ़ा हुआ वेतनमान वापिस लेने, सेवानिवृत्ति के समय वसूली, समान लाभ न देने और पदोन्नति में देरी से जुड़े होते हैं। नीतियां फाइलों में धूल खा रही है न्यायालय ने राज्य की 2018 में बनाई गयी मुकदमा नीति का हवाला दिया। जिसमें छोटे-मोटे विवादों के निपटारे के लिये राज्य, जिला और विभागीय स्तर पर समितियों के गठन का प्रावधान था। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा है कि यह नीति सिर्फ कागजों तक सीमित रह गयी है। ंमामला एक सेवानिवृत्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का है। जिस पर 94.56 की वसूली निकाली गयी थी। सिंगल बेंच ने इसे रद्द कर दिया। लेकिन शासन ने 711 दिनों की देरी से अपील दायर की और इसके लिये देरी माफी का आवेदन भी दिया। जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। 17 फरवरी को दिये गये अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने सरकारी अधिवक्ता को प्रभारी अधिकारी के साथ नोटशील लाने का निर्देश दिया और अदालत ने पूछा कि डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर करने की अनुमति किसने दी।
कोर्ट का समय भी बर्बाद हो रहा है
कोर्ट ने कहा कि अब तक ऐसा कोई मामला नहीं आया है, जिसमें प्रथम और द्वितीय श्रेणी के अधिकारी इस तरह के विवाद लेकर हाई कोर्ट पहुंचे हों। मंत्रिपरिषद को विचार करना चाहिए कि निचले कर्मचारियों को ही क्यों परेशान किया जा रहा है। इससे कोर्ट का बहुमूल्य समय भी बर्बाद हो रहा है।
