गोल्डन टॉवर को झुके हुए 26 दिन बीते, इस जिला प्रशासन मौन, महापौर मुद्दा उठाया लेकिन कार्यवाही नहीं

यह सूचना गोल्डन टॉवर पर लगाई गई थी, जिसे भी हटवा दिया गया हैग्वालियर. नेहर कॉलोनी स्थित गोल्डन टॉवर अब पहचान की मोहताज नहीं है। घटिया निर्माण और लोगों की जान को खतरे में डालने वाली इस टॉवर का 16 जुलाई को एक पिलर ध्वस्त हुआ था। जिसके बाद बिल्डिंग एक ओर झुक गयी है। आनन-फानन में सभी 27 फ्लैट खाली कराये गये थे। घटना को 26 दिन हो चुके है। लोग यहां वहां किराये के मकान में रहने को मजबूर है। यहां रहने वाले कर्ज में आ चुके है। अब मुद्दे को महापौर और कांग्रेस प्रतिनिधि उठाने जा रहे हैं। क्षेत्रीय पार्षद व कांग्रेस नेता प्रमोद खरे ने साफ शब्दों में बिल्डर और ठेकेदार पर एफआईआर दज्र कराने की मांग की है। उनका कहना है कि हमारी महापौर शोभा सिकरबार ने पहले ही इस मुद्दे को उठाया है। गिम इस बिल्डिंग को साफ शब्दों में रहने योग्य नहीं ऐसा मान चुके है। ऐसे में सबसे पहले बिल्डर औरे ठेकेदार पर कार्यवाही होनी चाहिये। अवैध निर्माण पर अधिकारी क्या खामोश है। भवन अनुमति देने वाले तत्कालीन भवन अधिकारी को जांच में शामिल करना चाहिये। इस संबंध में लोग हमारे पास आकर मांग कर रहे हैं।
अभी भी झुका है गोल्डन टॉवर
पार्षद प्रमोद खरे ने कहा है कि पिलर ध्वस्त हुआ बिल्डिंग झुक गयी है। समय रहते प्रशासन, पुलिस ने रेस्क्यू कर 27 फ्लैट खाली करा लिये गये, लेकिन कुछ नहीं हुआ तो इसका मतलब यह नहीं है कि मामले को हल्के में लिया जा रहा है। यह अपने आप में बड़ी घटना है। बिल्डंर ने तो घटिया निर्माण कराकर महंगे दाम में फ्लैट बेच दिये थे। पार्षद ने बताया है कि यदि बिल्डिंग गिर ही जाती है और रेस्क्यू का समय ही नहीं मिलता है। इसमें किसी की जान चली जाती तभी इस घटना को गंभीर माना जाता है।
तत्कालीन भवन अधिकारी ने परमिशन कैसे ही जांच कराई जाए
कांग्रेस नेता व पार्षद प्रमोद खरे का कहना है कि इस पूरे मामले में तत्कालीन भवन अधिकारी को भी जांच में शामिल करना चाहिए कि उसने उस समय कैसे भवन अनुमति दी। अनुमति देने के बाद जांच क्यों नहीं कराई। क्योंकि “गोल्डन टॉवर’ में बेसमेंट से लेकर पेंटा हाउस तक अवैध हैं, लेकिन इस अवैध निर्माण पर नगर निगम के अधिकार चुप्पी साधे बैठे हैं। यह खामोशी सांठगांठ की है या फिर कोई बड़ी कार्रवाई का संकेत है। “गोल्डन टॉवर’ को बिना समझे और जांचे भवन अनुमति देने वाले तत्कालीन भवन अधिकारी महेन्द्र अग्रवाल पर भी सवाल खड़े होते हैं।

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