ग्वालियर में संजोईं पोखरण की यादें, ऐतिहासिक शहर तकनीक में भी समृद्ध

ग्वालियर. वैसे तो ग्वालियर की पहचान भारत के जिब्राल्टर के रूप में प्रसिद्ध किले सहित अन्य ऐतिहासिक इमारतों और पुरा संपदाओं के कारण होती है, लेकिन तकनीक के मामले में भी शहर का इतिहास बहुत समृद्ध है। भले ही देश को परमाणु शक्ति बनाने का काम हो या फिर अंतरिक्ष मिशनों के लिए क्रायोजेनिक इंजन तकनीक विकसित करने की बात हो, इनका कुछ न कुछ कनेक्शन ग्वालियर से जरूर है। इसके अलावा शहर में डीआरडीओ की लैब में लगातार नए-नए प्रयोग कर तकनीकें विकसित की जा रही हैं, जो देशहित में बहुत कारगर साबित हो रही हैं।
आज से ठीक 26 साल पहले पोखरण में परमाणु परीक्षण कर देश को परमाणु शक्ति बनाने का काम पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हुआ था। स्व. अटलजी का ग्वालियर से गहरा नाता है और इसी शहर में अटलजी की स्मृति में बनाए गए संग्रहालय में पोखरण परीक्षण की यादों को संजोया गया है। गोरखी में बनाए गए अटल म्यूजियम में पोखरण परीक्षण से जुड़े फोटो और अन्य गतिविधियों को प्रदर्शित किया गया है। पोखरण में जिस प्रकार के परमाणु बमों का विस्फोट किया गया था, उनके माडल इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं। इसके अलावा उस समय के फोटोग्राफ भी यहां लगाए गए हैं। अब इस म्यूजियम में होलोग्राफिक तकनीक के जरिए परमाणु परीक्षण का सीन रीक्रिएट करने के लिए काम किया जा रहा है। इसमें अटलजी के साथ तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज और महान वैज्ञानिक व पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम मंत्रणा करते हुए नजर आएंगे। स्मार्ट सिटी कार्पोरेशन द्वारा कराए जा रहे अपग्रेडेशन का काम पूरा होने के बाद में सैलानियों को यह सीन बिल्कुल सजीव नजर आएगा।
देश में विकसित की क्रायोजेनिक इंजन तकनीक
इसरो जल्द ही मिशन गगनयान के तहत तीन सदस्यीय दल को तीन दिन के मिशन के लिए पृथ्वी की कक्षा में भेजेगा। इसकी घोषणा पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी की थी। गगनयान मिशन में जिस क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया जाएगा, उसे भारत में विकसित करने का श्रेय ग्वालियर के पिछोर कस्बे से निकलकर इसरो तक पहुंचने वाले वैज्ञानिक डा. नवल किशोर गुप्ता को जाता है। वे एमआइटीएस में वर्ष 1971 बैच के मैकेनिकल इंजीनियरिंग छात्र रहे हैं। क्रायोजेनिक इंजन तकनीक पहले भारत को रूस से मिलने वाली थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण रूस ये तकनीक देने से पीछे हट गया। इस बीच डा. नवल किशोर गुप्ता और उनकी टीम को रूस भेजा गया। वहां उन्होंने क्रायोजेनिक इंजन को देखा और वर्ष 1995 से 2002 के बीच इसे भारत में विकसित किया। अब आगामी गगनयान मिशन में इसी तकनीक का इस्तेमाल कर मानव को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।

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