जौरा के गांधी सेवा आश्रम में मोहरसिंह और माधोसिंह ने किया था आत्मसमर्पण

ग्वालियर/जौरा. डकैतों के आतंक की कहानियों के लिये कुख्यात चंबल घाटी में अपने आतंक की अनगिनत कहानियां और किवदंतियां लिखने वाले आत्मसमर्पित डकैत सरगना मोहर सिंह मंगलवार की सुबह निधन हो गया है वह 92 वर्ष पूर्ण कर चुके थे। 60 से 70 के दशक तक चंबल में 2 सबसे बड़े डाकू गैंग थे। मोहर सिंह और माधोसिंह। मोहरसिंह ने 1972 में अपने गैंग के साथ पगारा बांध पर जयप्रकाश नारायण से भेंट की और फिर 14 अप्रैल 1972 को जौरा स्थित गांधी सेवा आश्रम जिला मुरैना में अपने साथियों समेत गांधी जी की तस्वीर के सामने हथियार रखकर आत्म समर्णण कर दिया था। उस समय मोहर सिंह पर मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान आदि राज्यों की पुलिस ने 2 लाख रूपये का इनाम घोषित कर रखा था जिसका आज के समयानुसार 10 करोड़ से अधिक हैं। मोहर सिंह के खिलाफ देश के विभिन्न थानों में 3 सौ से अधिक हत्या के मामले दर्ज थे लेकिन बकौल मोहर सिंह ने यह गिनती बहुत कम थी।
नगरपालिका अध्यक्ष बने
आत्मसमर्पण के बाद मोहर सिंह ने भिण्ड जिले के मेहगांव कस्बे को अपना घर बनाया और वहीं रहने लगे। वह दाड़ी रखाते थे इसलिये वह वहां दाढ़ी के नाम से ही विख्यात थे। वह हंसमुख और मिलनसार थे इसलिये हर उम्र के लोगों में उनकी खासी लोकप्रियता थी। यह इतनी अधिक थी कि वह एक बार नगर पालिका मेहगांव के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़े और निर्दलीय ही चुनाव जीत गये और इसके बाद उन्होंने इस बीच विकास के काम भी करवाये, लोगों ने उसने फिर चुनाव लड़ने को भी कहा तो उन्होंने मना कर दिया।
क्यों बने डकैत
अपने समय के सबसे खूंखार डकैत मोहरसिंह ग्राम जटेपुरा गांव में दबंगों ने उनकी जमीन छुडा ली और पुलिस से मिलीभगत करके बन्द भी करा दिया। इसके बाद मोेहर सिंह डकैत हो गये और फिर उसने अपने आतंक से पूरे उत्तर भारत को दहलाकर रख दिया। आत्मसमर्पण के समय इसके गैंग में 37 सदस्य थे। जब मोहर सिंह गैंग ने आत्मसमर्पण किया तब उसके पास सारे ऑटोमेटिक हथियार थे जो पुलिस के पास भी नहीं थे। उसने जब समर्पण किया तो एक एलएलआर, टॉमीगन, 303 बोर की 4 रायफल, ऑटोमेटिक 4 एलएमजी, स्टेनगन, मार्क 5 रायफल समेत भारी असलाह गांधी के चरणों में रख दिया। जेल भी काटी और फिल्म में हीरो भी बने मोहरसिंह और माधोसिंह कहने को तो अलग अलग गैंग थे लेकिन दोनों के बीच खूब याराना था। मोहर सिंह द्वारा माधोसिंह का बहुत आदर किया  जाता था। दोनों गिरोह ने एक साथ आत्मसमर्णण किया और फिर जेल में रहकर मुकदमे निपटाने के बाद ही बाहर आये और बाद में चम्बल के डाकू के नाम से एक फिल्म भी बनी इसमें मोहरसिंह और माधोसिंह दोनों ने अपनी अपनी भूमिकायें निभाई।
साभार कटेंट-देव श्रीमाली

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