80 हजार शिक्षकों की पुरानी पेंशन के मामले में हाईकोर्ट का आदेश नहीं मान रहा है विभाग, फैसले पर रीव्यू याचिका की तैयारी
भोपाल. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का हाल ही एक बड़ा अदालती आदेश सामने आया है। जिसके मुताबिक साल 2018 में स्कूल शिक्षा विभाग में शामिल किये गये पूर्व शिक्षाकर्मियों को न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) के बजाय पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस) का लाभ मिलना तय हुआ है। जबलपुर हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने सुशील कुमार तिवारी बनाम मप्र शासन के मामले में यह फैसला सुनाते हुए राज्य शासन को निर्देश दिये थे कि याचिकाकर्ता का एनपीएस में काटा गया फंड ट्रांसफर कर उन्हें पुरानी पेंशन योजना के दायरे में लाया जाये। 3 माह पहले हुए इस फैसले पर स्कूल शिक्षा विभाग ने अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। अब विभाग इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है।
विवाद पुराना है 2018 से संविलियन के वक्त से ही लंबित
यह पूरा विवाद 2018 में हुए संविलियन के वक्त से ही लंबित चला रहा है। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया कि 22 अगस्त 1998 को जिला पंचायत द्वारा शिक्षाकर्मी वर्ग-2 के पद पर नियुक्त किये गये थे। इसके बाद पंचायत अध्यापक संवर्ग नियम 2008 के तहत अध्यापक और फिर वरिष्ठ अध्यापक बनाये गये। 15 फरवरी 2019 को उन्हें उच्च माध्यमिक शिक्षक के पद पर पदस्थ किया गया। लेकिन विभाग ने वर्ष 2018 के सेवा भर्ती नियमों के नियम 18.2 का हवाला देकर उन्हें नयी नियुक्ति करार दिया और पुरानी सेवाओं को दरकिनार करते हुए उन पर एनपीएस थोप दिया।
मर्जर था नई भर्ती नहीं माना जा सकता
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बीच शासन के तर्को को पूरी तरह से खारिज कर दिया अदालत ने 2008 के अध्यापक संवर्ग नियमों के नियम 5 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि शिक्षाकर्मियों को अध्यापक बनाना मात्र एक संविलियन (मर्जर) और पदनाम का बदलाव था। चूकि कर्मियों की सेवा में एक भी दिन का व्यवधान नहीं रहा है। इसलिये इसे नयी भर्ती नहीं माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि पेंशन के प्रयोजन के लिये संविलियन से पूर्व की पूरी सेवा अवधि को गिना जाये और उन्हें ओपीएस की पात्रता दी जाये।
