रतनगढ़ माता हैं मुगलों पर विजय की निशानी है, डकैतों की आराध्य देवी है रतनगढ़ माता

ग्वालियर. मध्यप्रदेश में कई चमत्कारिक मंदिर है। इन्हीं में से एक है दतिया का रतनगढ़ माता का मंदिर है और इसके चमत्कारों की कहानी दूर-दूर तक फैली हुई है। विंध्याचल पर्वत पर रतनगढ़ देवी का प्रसिद्ध मंदिर विद्यमान है। कहते हैं नाग के काटने पर यहां मिट्टी का भभूत शरीर पर लगाने भर से बड़े से बड़ा जहर उतर जाता है। इसलिये यहां दीवाली की भाई दूज पर सर्पदंश के उपचार के लिये मेला भी लगता है। दतिया जिला मुख्यालय से 65 किमी दूर दूर मर्सेनी (सेंवढ़ा) गांव है। यहां एक मंदिर रतनगढ़ मां का और दूसरा ठीक सामने कुंवर बाबा का मंदिर है। कुंवर बाबा, मां रतनगढ़ देवी के भाई है। ऐसी मान्यता है कि मां के दर्शन के बाद यदि कुंवर बाबा के दर्शन न किये जाये तो मां के दर्शन पूर्ण नहीं माने जाते है। रतनगढ़ माता मंदिर डकैतों के आराध्यस्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है।
रतनगढ़ मां के मंदिर का इतिहास
प्रसिद्ध रतनगढ़ माता के मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। ऐसा प्रचलित है कि महाराज रतन सिंह के किले पर कब्जा करने की नीयत से मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 से 1321 के बीच साजिश रची थी। खिलजी ने सेंवढ़ा से रतनगढ़ आने वाला पानी बंद करा दिया था। तब राजकुमारी मांडूला और उनके भाई कुंवर गंगा रामदेव ने अलाउद्दीन खिलजी के फैसले का कड़ा विरोध किया था। रतन सिंह की बेटी मांडुला पर भी अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर थी। यही कारण था कि विरोध के बाद खिलजी ने वर्तमान मंदिर रतनगढ़ वाली माता के परिसर में बने किले पर आक्रमण कर दिया। आक्रमणकारियों की बुरी नजर से बचने के लिए राजकुमारी मांडुला ने जंगल में समाधि ले ली और धरती मां से प्रार्थना की, कि वो उन्हें अपनी गोद में स्थान दें। लोग ऐसा कहते हैं कि धरती में हुई एक दरार में वह समा गई थी। इन्हीं राजकुमारी माडुंला को मां रतनगढ़ वाली माता के रूप में पूजा जाता है। साथ ही मां रतनगढ़ के भाई राजकुमार कुंवर गंगा रामदेव भी युद्ध में शहीद हो गए। इसके बाद इसी मंदिर में कुंवर बाबा के रूप में उनकी भी पूजा की जाने लगी।
बीहड़ के डकैत मां को आराध्या देवी मानते हैं
बागी, डकैत और बन्दूक के लिये चर्चित ग्वालियर-चम्बल का डकैतों से गहरा नाता सैकड़ो वर्ष पुराना है। रतनगढ़ वाली माता वीरों और शक्ति की प्रतिमूर्ति है। ऐसा माना जाता है कि यहां कई कुख्यात डकैत रहा करत थे। रतनगढ़ वाली माता मंदिर में चम्बल इलाके के सभ डकैत पुलिस का चुनौती देते हुए नवरात्र में दर्शन करने आते थे और मंदिर पर घंटा चढ़ाते थे। कई बार ऐसा हुआ है कि पुलिस पहरा देती रही और डकैत घंटा चढ़ाकर निकल गये। डकैत मानते थे कि मां उनकी रक्षा करती है। बड़े डकैतों में मानसिंह, जगन गुर्जर, मोहरसिंह, माधौ सिंह, मलखान सिंह से लेकर फूलनदेवी ने माता के चरणों में माथ टेका और घंटा चढ़ाकर आर्शीवाद लिया है।
शिवाजी ने कराया था मंदिर का निर्माण
विंध्याचल पर्वत पर विराजमान मां रतनगढ़ का मंदिर का निर्माण छत्रपति शिवाजी के मुगल साम्राज्य पर विजय की निशानी है। ऐसी मान्यता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज और मुगलों के बीच युद्ध हुआ था। उस वक्त शिवाजी को हार मिली थी। तब रतनगढ़ वाली माता और कुंवर बाबा ने शिवाजी महाराज के गुरू रामदास को देवगढ़ के किले में दर्शन दिये थे और शिवाजी को मुगल साम्राज्य से फिर से युद्ध के लिये प्रेरित किया था। मां के आर्शीवाद के बाद शिवाजी ने मुगल सेना से फिर युद्ध किया और मुगल साम्राज्य को हार का सामना करना पड़ा था, इसके शिवाजी ने मंदिर का निर्माण कराया था।

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