दुर्गम पहाड़ी पर विराजमान है ढोलकल गणेश जी, 10वीं शताब्दी का है 3हजार फीट की ऊंचाई पर हैं मंदिर
दंतेवाड़ा. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 3 हजार फीट की ऊंचाइ्र पर विराजमान ढोलकल गणेश जी की मूर्ति 10वीं शताब्दी की बताई जा रही है। इस प्राचीन मंदिर से कई कथायें जुड़ी हुई है। आज पूरे देश में गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाया जा रहा है। इस 10 दिवसीय गणेशोत्सव का समापन 2 सितम्बर को अनंत चर्तुदशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ होगा। गणेश चतुर्थी पर भक्त अपने घरों में भगवान गणेश की प्रतिमा ओं को स्थापित करते हैं और 10 उिदनों तक उनकी उपासना करते हैं।
इस बीच कई भक्त गणपति के विभिन्न मंदिरों में दर्शन के के लिये भी जाते हैं और प्रथम पूज्यनीय गणेश की महिमा का इस उत्सव के दौरान गुणगान किया जाता है। गणेश चतुर्थी के इस पावन अवसर पर हम आपको 10वीं शताब्दी के एक प्राचीन गणेश मंदिर की महिमा के बारे में बताते हैं। जिसे ढोलकल गणेश कहा जाता है और इसकी कथा एकदंत से जुड़ी हुई है।
भारतीय वन सेवा अधिकारी प्रवीण कास्वां ने गणेश चतुर्थी के पावन मौके पर ढोलकल गणेश की तस्वीर शेयर की है और लिखा है जहां भगवान गणेश शांत वातावरण में बैठते हैं। बस्तर वन में 1100 वर्ष पुरानी गणेश की मूर्ति नागवंशी राजवंश के समय बनाई गयी थी। प्रतिमा ढोल के आकार की है और पहाड़ की चोटी पर स्थित है जो कि जंगल के अन्दर लगभग 14 किमी की दूरी पर विराजमान हैं।
ढोलकल गणेश का मंदिर 10वीं शताब्दी में बना था
ऐसा लोग बताते हैं पुरातत्व विभाग के अनुसार ढोलकल पर ललितासन मुद्रा में विरोजमान गणेश जी की दुर्लभ प्रतिमा 11वीं शताब्दी में बताई जाती है। कहा जाता है कि 10वीं शताब्दी के बीच छिंदक नागवंशी राजाओं ने ढोलकल गणेश मंदिर का निर्माण कराया था। जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से 13 किमी दूर स्थित यह खूबसूरत जगह उन प्रकृति प्रेमियों के लिये स्वर्ग है जो हरी भरी पहाडि़यों के बीच ट्रेकिंग करना पसंद करते हैं।
परशुराम और गणेश जी के बीच हुआ था युद्ध
इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसी पहाड़ी पर भगवान गणेश और परशुराम जी के बीच युद्ध हुआ था। इस युद्ध में परशुराम जी के फरसे से गणेश जी का एक दांत टूट गया था। जिसके चलते वे एकदंत कहलाये। इस पहाड़ी के शिखर के नीचे स्थित गांव का नाम परशुराम जी के फरसे के आधार पर फरसपाल रखा गया है।
