क्या है अरावली रेंज की परिभाषा? 21 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में होगी 21 जनवरी को अगली सुनवाई
नई दिल्ली. अरावली पर्वतमाला से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से कई महत्वपूर्ण सवालों पर जवाब मांगा है। मुख्य न्यायधीश सूर्यकांत ने कहा है कि अदालत इस बात को लेकर काफी गंभीर है। अरावली पर्वतमाना को किस तरह परिभाषित किया जा रहा है। अदालत के अनुसार मौजूदा परिभाषा से पर्यावरण संरक्षण का दायरा सीमित होने का खतरा पैदा हो सकता है। न्यायालय ने इसके साथ ही 20 नवम्बर के फैसले पर रोक लगा दी है।
सुनवाई के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालत के किसी भी आदेश या रिपोर्ट को लागू करने से पहले एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच आवश्यक है। न्यायालय ने यह भी प्रस्ताव रखा कि इस हाईपावर्ड एक्सपर्ट कमेटी गठित की जाये। पूरे मामले की गहराई से और समग्र तरीके से जांच करें। इस कमेटी में केवल अधिकारी नहीं, बल्कि विषय से जुड़े विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिये। मुख्य न्यायधीष्ज्ञ ने कहा है कि हम इस बात पर मार्गदर्शन चाहते हैं। क्या अरावली की परिभाषा को सिर्फ 500 मीटर तक सीमित करना एक संरचनात्मक विरोधाभास पैदा करना है। जिससे संरक्षण क्षेत्र और संकुचित हो जाता है। अदालत ने यह सवाल भी उठाया है कि क्याइससे गैर अरावली इलाके का दायरा बढ़ गया है। जहां नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है।
21 जनवरी को होगी अरावली पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई
इस मामले में सीनियर वकील के परमेश्वर को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया है। केन्द्र सरकार की तरफ से सचिव, पर्यावरण मंत्रालय का जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भाटी ने 4 राज्यों के मुख्य सचिवों को कमेटी में शामिल करने का सुझाव दिया। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इसमें डोमेन एक्सपर्ट्स की जरूरत है। अरावली केस की अगली सुनवाई 21 जनवरी को की जायेगी। न्यायालय ने यह भी पूछा कि अगर 2 संरखित क्षेत्रों के बीच 700 मीटर का अन्तर है। तो क्या उस खाली हिस्से में खनन की अनुमति दी जानी चाहिये। इसके साथ ही यह सवाल भी रखा गया है कि पारिस्थितिक निरंतरता यानी इको लॉजिकल कंटिन्यूटी को कैसे सुरक्षित रखा जायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर नियमों में कोई बड़ा अन्तर या कमी सामने आती है। क्या अरावली पर्वतमाला की संरचनात्मक मजबूती बनाये रखने के लिये विस्तृत मूल्यांकन की जरूरत होगी। अदालत ने अल्पकालिक और दीर्धकालिक दोनों तरह के पर्यावरण प्रभावों का आकलन करने की बात कहीं हे।
