सिंधिया तो भाजपा में घुल-मिल गए, बाकी नेता रह गए बेगाने
भोपाल. साढ़े तीन साल पहले कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या 2014 में कांग्रेस छोड़कर आए संजय पाठक, ये तो भाजपा में घुल-मिल गए। पार्टी की रीति-नीति को भी अपना लिया, लेकिन उनके साथ आए समर्थक अब तक एकरस नहीं हो पाए हैं। यही हाल कई अन्य नेताओं का है, जिन्हें भाजपा ने शामिल तो कराया, लेकिन उन्हें उनके ही हाल पर छोड़ दिया।
अभी यह है हाल
कुछ भाजपा का साथ छोड़कर फिर कांग्रेस में लौट गए तो कुछ अभी भी इस प्रतीक्षा में हैं कि उनका पुनर्वास अवश्य होगा। भाजपा ने बहुजन समाज पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष भुजबल सिंह अहिरवार को भी शामिल कराया लेकिन अब वो भी मुख्यधारा में नहीं हैं।
ठाकुर को नहीं बनाया मंत्री
कांग्रेस के कद्दावर आदिवासी नेता रहे पूर्व मंत्री प्रेमनारायण ठाकुर का ही उदाहरण लें तो वे कमल नाथ का विरोध कर भाजपा में आए और अमरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से 2008 में चुनाव जीते लेकिन मंत्री नहीं बनाए गए। अंतत: वे हाशिए पर चले गए और उनके धुर विरोधियों को अब पार्टी में लाया जा रहा है।
मोनिका शाह बट्टी को लिया पार्टी में
पहले गोंडवाना पार्टी के नेता मनमोहन शाह बट्टी को लाने के प्रयास हुए अब उनकी बेटी मोनिका शाह बट्टी को भाजपा में ले लिया गया। यही हाल पूर्व मंत्री मानवेंद्र सिंह, विधायक नारायण त्रिपाठी, पूर्व सांसद भागीरथ प्रसाद, विधानसभा में कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष रहे चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी हों अथवा पूर्व मंत्री बालेंदु शुक्ल, समंदर पटेल, बैजनाथ यादव, वीरेंद्र रघुवंशी का भी रहा।
मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए चौधरी
2013 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस विधायक दल के कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष रहे चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी भाजपा में शामिल हुए थे पर लंबा समय बीतने के बाद भी वे पार्टी की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए। पार्टी ने उनके छोटे भाई चौधरी मुकेश सिंह को विधानसभा तक पहुंचाया, लेकिन राकेश सिह का पुनर्वास नहीं कर पाई। वे लंबे समय तक भाजपा में सक्रिय रहे लेकिन जब पार्टी ने उन्हें तवज्जो नहीं दी तो उन्होंने भोपाल आना ही छोड़ दिया। बाद में वे कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हो गए। चतुर्वेदी को भाजपा में लाते वक्त प्रदेश भाजपा संगठन महामंत्री अरविंद मेनन थे। मेनन के चले जाने से पार्टी में उनकी परवाह करने वाला कोई नहीं बचा।
प्रेमनारायण ठाकुर सहित कई दिग्गज हाशिए पर
कांग्रेस के कई कद्दावर नेता भाजपा में शामिल तो हुए, लेकिन वे भाजपाई नहीं बन पाए। छिंदवाड़ा में कमल नाथ जैसे वरिष्ठ नेता का विरोध कर आदिवासी नेता प्रेमनारायण ठाकुर भी 2008 में भाजपा में आए लेकिन हमेशा हाशिए पर रहे । भाजपा के टिकट पर वे चुनाव तो जीत गए लेकिन पार्टी ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया। 2013 के चुनाव में पार्टी ने उनके बेटे उत्तम सिंह ठाकुर को टिकट दिया लेकिन वे 4063 वोट से हार गए।
हराने में झोंक दी थी पूरी ताकत
इस चुनाव की खास बात ये थी कि कमल नाथ और उनके समर्थकों ने उत्तम को हराने में पूरी ताकत झोंक दी। वहीं भाजपा ने उन्हें पूरे मन से सहयोग नहीं किया। इस चुनाव में नोटा ने भी नुकसान पहुचाया। नोटा पर आठ हजार से ज्यादा मत पड़े थे। 2018 में भी प्रेमनारायण ठाकुर चुनाव लड़े पर तीसरे नंबर पर रहे। मंगलवार को भाजपा नेताओं ने गोंडवाना पार्टी की मोनिका शाह बट्टी को भाजपा की सदस्यता दिलाई, लेकिन अमरवाड़ा में भाजपा संगठन उनके विरोध में है। कहा जाता है कि गोंडवाना पार्टी के नेताओं ने हिंदू धर्मग्रंथ जलाए थे, तब से आदिवासी वर्ग भी नाराज है।
मानवेंद्र के बेटे को मिला टिकट
दिग्विजय शासनकाल में कैबिनेट मंत्री रहे मानवेंद्र सिंह भी 2013 में भाजपा में शामिल हो गए थे । सिंह कांग्रेस के उन कद्दावर नेताओं में से थे जिनके लिए पार्टी मायने नहीं रखती। यही वजह है कि जब 2008 में कांग्रेस ने सिंह को टिकट नहीं दिया तो वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत गए। अब 2023 के चुनाव में भाजपा ने उनके बेटे कामाख्या सिंह को टिकट दिया है।
संजय पाठक का ही हो पाया पुनर्वास
कांग्रेस से आए नेताओं का जिक्र किया जाए तो पूर्व सांसद भागीरथ प्रसाद ,राव उदय प्रताप सिंह सहित कई अन्य नेता हैं पर पुनर्वास सिर्फ संजय पाठक का हो पाया। पाठक विजयराघवगढ़ सीट से दो बार कांग्रेस विधायक रहे हैं। 2016 में पार्टी में भारी विरोध के बाद भी उन्हें मंत्री बनाया गया था।

