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बिरसा मुंडा का स्वाधीनता आंदोलन में रहा अतुलनीय योगदान- विक्रांतसिंह कुमरे


ग्वालियर. जीवाजी विश्वविद्यालय के जनजातीय अध्ययन एवं विकास केन्द्र तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती समारोह के उपलक्ष्य में चल रहे जनजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा (1 से 15 नवंबर, 2025) के अंतर्गत विभाग में जनजातीय सांस्कृतिक, शैक्षिक और जागरूकता गतिविधियों के तहत एक विशेष व्याख्यान, भाषण एवं पोस्टर प्रतियोगिता तथा जनजातीय नायकों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि के रूप में विक्रांत सिंह कुमरे, सलाहकार, जनजातीय अध्ययन केन्द्र, राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय, भोपाल उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि विक्रांतसिंह कुमरे ने अपने विशेष व्याख्यान में भगवान बिरसा मुंडा के जीवन संघर्ष को विस्तृत रूप में बताया कि कैसे मात्र 25 वर्ष की आयु में ही बिरसा मुंडा औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध जन-प्रतिरोध का महानायक बन गया। जब ब्रिटिश अधिकारी और स्थानीय जमींदार जनजातीय समुदायों का शोषण कर रहे थे, उनकी जमीनें हड़प रहे थे और उन पर अमानवीय अत्याचार कर रहे थे तब धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा इस सामाजिक और आर्थिक अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े हुए और जनजातीय लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरुक कर संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया और ब्रिटिश उत्पीड़न के विरुद्ध ‘उलगुलान’ का जयघोष कर मुंडा विद्रोह का नेतृत्व किया। बिरसा मुंडा की सूझबूझ ने एक ओर जनजातीय लोगों द्वारा बिना किसी हस्तक्षेप के अपनी भूमि पर स्वामित्व और खेती करने के अधिकार को, तो दूसरी ओर जनजातीय रीति-रिवाजों और सामाजिक मूल्यों के महत्व को एक साथ जोड़ा। श्री कुमरे जी ने भगवान बिरसा मुंडा के साथ ही अन्य प्रमुख जनजातीय नायकों एवं उनके संघर्षों एवं जनजातीय समाज के लिए किए गए उनके कार्यों के बारे में भी बताया। कुलगुरु डॉ राजकुमार आचार्य ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि बिरसा मुंडा जैसे जननायक मात्र 25 वर्ष की उम्र में ही राष्ट्र के लिए अपना बलिदान दिया और अग्रेजों के विरुद्ध अपना आंदोलन कर देश के युवाओं को जनजागृत कर अग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एकत्रित किया l आज उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सब उनके द्वारा बताए हुए सिद्धांतों पर चलें l
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. शान्तिदेव सीसोदिया ने बताया कि एक समय था जब भगवान बिरसा मुंडा और अन्य ऐसे ही जनजातीय नायकों का नाम इतिहास में गुमनाम था। जब भारत सरकार ने 2021 में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को स्मरण करने के लिए धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया जिससे युवा पीढ़ी को ऐसे महान देशभक्तों के वीरतापूर्ण योगदान के बारे में अधिक जानकारी मिली। विभाग में लगी जनजातीय नायकों की प्रदर्शनी तथा भाषण एवं पोस्टर प्रतियोगिता इसी तरह का ही एक प्रयास है।
भाषण प्रतियोगिता के प्रतिभागियों के श्रेष्ठ प्रदर्शन का निर्णय डॉ. मुक्ता जैन एवं डॉ. शिल्की चौधरी ने किया, जिसमें प्रथम स्थान कुमकुम सिंह ने, द्वितीय स्थान हर्षित शुक्ला ने तथा तृतीय स्थान आदित्य माहौर एवं प्रियंका शर्मा ने प्राप्त किया। पोस्टर प्रतियोगिता के प्रतिभागियों के श्रेष्ठ प्रदर्शन का निर्णय डॉ. याशी जैन एवं डॉ. अमिता खरे ने किया, जिसमें प्रथम स्थान रहनुमा खातून ने, द्वितीय स्थान शाक्षी शर्मा ने तथा तृतीय स्थान अनन्या बघेल ने प्राप्त किया। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि तथा कुलगुरु द्वारा प्रमाणपत्र वितरित किया गया। कार्यक्रम में 50 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया जिनमें सभी को प्रमाणपत्र वितरित किए गए, कार्यक्रम में शैक्षणिक स्टाफ एवं शोधरथियों सहित 100 से अधिक अधिक लोग उपस्थित रहे।
इस अवसर पर डॉ. सतेन्द्र सिकरवार, डॉ. रेनू गर्ग, डॉ. दीप्ति राठोर, डॉ. आनंद कुशवाह, डॉ. अमित यादव, डॉ. सिबकुमारी सिंह, डॉ. गंगोत्री मिश्रा, डॉ. कृतिका प्रधान, राहुल कुमार, पूर्णिमा यादव, वैशाली गुर्जर, राजकुमार गोखले, प्रिया सुमन, राहुल बरैया एवं सामिन खान आदि अतिथि विद्वान, शोधार्थी एवं छात्र-छात्रा उपस्थित रहे।

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