20% अटका तो कौन जिम्मेदार, जल संसाधन विभाग ने 22 वर्ष पहले थे मुआवजे के 1.5 करोड़ रूपये अब देना होंगे 410 करोड़ रूपये
ग्वालियर. अलापुर बांध परियोजना की 22 वर्ष पुरानी भू-अर्जन प्रक्रिया फिर से चर्चाओं में है। 2002-04 में 5 गांवों की लगभग 70 हेक्टर जमीन अधिग्रहित की गयी थी ।तब किसानों को 80 प्रतिशत मुआवजा दिया गया था। लेकिन जल संसाधन की अनदेखी की वजह से स्वयं लाभ पहुंचाने की नीयत 20% (करीब 1.5 करोड़) का भुगतान लंबित रह गया है। पूरा भुगतान नहीं हो पाने की वजह राजस्व रिकॉर्ड में विभाग के नाम दर्ज नहीं हो पाई। जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की जेबे गर्म होने की वजह से इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। जिससे शासन को आर्थिक नुकसान हो रहा है।
1894 के भू-अर्जन अधिनियम के तहत की गयी प्रक्रिया निरस्त मानी गयी। इसबीच डूब इलाके की जमीन पर कब्जा बना रहा और कुछ जमीन पर कॉलोनियां विकसित हो गयी।
अब मामला 2013 के नये भू-अर्जन अधिनियम के तहत प्रोसेस किया जा रहा है। नये कानून के प्रावधानों के अनुसार वर्तमान गाइडलाइन दर (1.20 से 4करोड़ प्रति हेक्टर) 100 सौलैशिम और ब्याज जोड़कर भुगतान करना होता है। इन प्रावधानों के चलते पहले का बकाया बढ़कर लगभग 410 करोड़ रूपये का प्रस्ताव बनाया गया है।
जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता एसके वर्मा के मुताबिक पुराने और नये अधिनियम के तहत परीक्षण कर शासन को भुगतान का प्रस्ताव भेजा गया है। स्वीकृति मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू की जायेगी। शासन के 410 करोड़ का आर्थिक नुकसान के कारणों का पता लगाकर संबंधित अधिकारी के खिलाफ EOW को पत्र भेजा जायेगा। सूत्रों से ऐसा पता चला है कि जल संसाधन में बैठे अधिकारियों ने कॉलोनियां बसाने के लिये एनओसी भी दी है। इनके खिलाफ भी कार्यवाही की तैयारी की जा रही है। बस इस बात का पता लगाना है कि इसके लिये कौन जिम्मेदार है।

