संस्कार मंजरी की  तृतीय काव्य गोष्ठी सम्पन्न-नवदुर्गा व्रत पूजा आइसोलेशन का सनातनी विधान-आशा सिंह

ग्वालियर 21मार्च | जनता कर्फ्यू की पूर्व संध्या पर नागरिकी मूल्यों के उन्नयन के लिए प्रतिबद्ध संस्था संस्कार मंजरी ने नव संवत्सर प्रचार श्रृंखला की तृतीय गोष्ठी मीरा नगर मुरार में सम्पन्न हुई। मुख्य अतिथि आशा सिंह विशिष्ट अतिथि अनूप गुप्ता एडवोकेट रहे अध्यक्षता आलोक शर्मा ने की ।संचालन डॉक्टर मुक्ता सिकरवार ने किया तथा आभार संस्था संस्थापक महामाया नीलम जगदीश गुप्ता ने किया ।
मुख्य आतिथि आशा सिंह ने कहा भारतीय नव संवत्सर के प्रारंभ से नवदुर्गा के अवसर पर व्रत करने व जप यज्ञादि के साथ आइसोलोशन में रहने का महत्व हमारे ऋषि समझते थे । यज्ञ विधान स्वयं को तथा वातावरण को सेनेटाइज करने के लिए ही किए जाते हैं । व्रत रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है । इसे शक्ति जागरण का पर्व इसीलिए कहा जाता है। इस अवसर पर आयोजित कवि गोष्ठी में अपने भाव व्यक्त किए ।

सीता चौहान पवन- ने अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए स्वच्छता पर जोर दिया

हाथ बार-बार धोइए ‘ रखिए स्वच्छ सदन
दूर से राम राम बोलिए मिले ना अंग से अंग
प्रभु इतनी ही प्रार्थना कुशल रहे सब जन
कोरोना के प्रभाव से बचा रहे यह वतन
कवि अनूप गुप्ता-ने अपनी पंक्तियां यों प्रस्तुत की…
माना कोरोना महामारी है
पर हमारी भी कुछ जिम्मेबारी है
हर समय हर जगह सिर्फ
धंधा दूंढने के अलावा थोड़ा समय
अपने समाज देश के बारे में
सोचने की बारी है
मात्र कुछ दूरी रखने
और हाथों को साफ रखने के
अलावा थूक्कड़ पन से
बाहर आने की बस
थोड़ी सी गुजारिश जारी है
एक दिन या कुछेक दिन
धंधा रिश्वत छोड़कर
देश – समाज के बारे में
परिवारों के बारे
सोचने की बारी है
जनसहयोग
या जनता कर्फ्यू लगाकर
कोरोना को भगाने की तै़यारी है
बस इतनी सी गुजारिश
सरकार की
समाज की
और हमारी जारी है
प्रतिभा द्विवेदी
मैं मनुष्य के पुरुषार्थ को इन पंक्तियों से आवाज दी
साहस कभी न हारना,
मन का मेरे मीत ।
अस्त्र-शस्त्र की हो नहीं,
हो साहस की जीत ‌ ।।
संगीता गुप्ता-ने प्रकृति से छेड़छाड़ करने वाले मनुष्य को चेतावनी देते हुए कहा
ये मनुष्य
बहुत कैद किया
तूने मुझे
पिंजड़ों में
अब कैद हो
जाओ तुम पिंजड़ों में
यही है हम बेजुबानों
की हाय
समझ लो अब तो
तुम भगवान नहीं हो
भगवान है वही
जो देखता है
साक्षी हो सब वह
और स्वत:
हो जाता है
बदला
सच ही है
उसकी लाठी में
आवाज़ नहीं होती।
मृदुला परिहार- ने स्त्री शक्ति पर अपनी भावनाओं इस प्रकार व्यक्त की
नारी तुम हो नर से भारी
भले बंटी हो तुम टुकड़ों में
नहीं पता है कौन हो इनमें
पर आस्तित्व स्वयं में पाने में सोचो नहीं जरा भी मन में
होगी जय जय कार तुम्हारी
नारी तुम हो नर से भारी ।

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