जेयू में भारतीय इतिहास में भारतीय ज्ञान परंपरा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू, पहले दिन 25 शोधपत्रों का हुआ वाचन
भारतीय ज्ञान परंपरा ही भविष्य का मार्गदर्शक: डॉ. ओमजी उपाध्याय
ग्वालियर। भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, जहां धर्म और अध्यात्म की परंपराएं अनेक आघातों के बावजूद आज भी जीवित हैं। चाहे चिकित्सा विज्ञान हो, खगोल विज्ञान या गणित भारत प्राचीन काल से ही इन क्षेत्रों में उन्नत रहा है। भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मार्गदर्शक है। यह भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक संतुलन दोनों का समन्वय प्रस्तुत करती है। आज आवश्यकता है कि इस परम्परा को आधुनिक संदर्भ में समझकर पुनर्जीवित किया जाए। यह बात भारतीय इतिहास अनुशंसान परिषद, नई दिल्ली के सदस्य सचिव डॉ. ओम जी उपाध्याय ने कही।
वह जीवाजी विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला तथा नोडल केन्द्र भारतीय ज्ञान परम्परा के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय इतिहास में भारतीय ज्ञान परम्परा विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के शुभारंभ पर मुख्य अतिथि की आंसदी से बोल रहे थे। अध्यक्षता जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजकुमार ने की। विशिष्ट अतिथि काश फाउंडेशन मुंबई के संस्थापक डॉ. अवकाश जाधव, जेयू कुलसचिव डॉ. राजीव मिश्रा एवं आयोजन सचिव डॉ. शांतिदेव सिसोदिया मंचासीन रहे।
संगोष्ठी के आरंभ में दीप प्रज्जवलन एवं सरस्वती वंदना की। स्वागत भाषण देते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. शांतिदेव सिसोदया ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक है। डॉ. अवकाश जाधव ने में कहा कि जो गुरु होता है, वह जीवन भर सीखता रहता है। उन्होंने कहा कि जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है, इसलिए हमें अपने ज्ञान और संस्कारों की जड़ों को समझना और सशक्त करना होगा। भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की प्राचीनतम, निरंतर और समग्र ज्ञान प्रणालियों में से एक है। यह केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन, विज्ञान, कला, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना का समन्वय है। इसकी जड़ें वैदिक काल में हैं और यह परम्परा आज भी जीवित है।
कुलगुरु डॉ. राजकुमार आचार्य ने कहा कि समय के साथ ज्ञान परंपरा का स्वरूप बदला है, जो परिवेश के परिवर्तन का परिणाम है। भारतीय ज्ञान परंपरा की महानता को समझने के लिए हमें अपने इतिहास में गहराई तक जाना होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले दो दशक भारत के स्वर्णिम दशक सिद्ध होंगे। इसके बाद पूर्ण सत्र का आयोजन हुआ। जिसके सत्राध्यक्ष डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के प्रो. राकेश कुमार गौतम एवं सह सत्राध्यक्ष यशवंत राव चवन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग नागपुर के प्रो. आकाश दौलतराम गेडाम थे। इस सत्र में प्रो. चेतराम गर्ग, डॉ. चित्तीबाबू पुचा, डॉ. अरविन्द कुमार गौतम, डॉ. वीरेन्द्र सिंह मत्सानिया, डॉ. उत्सव आनंद, डॉ. अरविन्द कुमार, डॉ. राजेन्द्र कुमार, डॉ. अतुल गुप्ता, डॉ. दीपक कुमार, डॉ. बीरेन्द्र नाथ प्रसाद, डॉ. गोविंद सिंह दांगी, डॉ. मनोज कुमार कर्मी, डॉ. पदम नारायण बौद्ध, डॉ. आशीष शिंदे के साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों से आए विद्वानों द्वारा 25 शोधपत्रों का वाचन किया गया, जिनमें भारतीय इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, दर्शन और ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर सारगर्भित प्रस्तुतियां दी गईं। इस दौरान शोधपत्रों पर विद्वानों के बीच विचार विमर्श भी हुआ। अंत में आयोजन सचिव डॉ. शांतिदेव सिसोदिया ने अतिथियों को शॉल, श्रीफल एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया। संचालन कुमकुम सिंह व प्रिया सुमन ने किया। आभार कुलसचिव डॉ. राजीव मिश्रा ने व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो. जेएन गौतम, प्रो. एसके सिंह, प्रो. राजेन्द्र खटीक, प्रो. समीर भाग्यवंत, प्रो. मनीष खैमरिया, प्रो. पीसी जाटव, डॉ. दिलीप कटारे, डॉ. सुनील पाठक, प्रो. डीएन गोस्वामी, प्रो. विवेक बापट, प्रो. एसएन महापात्रा, प्रो. महेंद्र गुप्ता, डॉ. मनोज शर्मा, डॉ. निमिषा जादौन, डॉ. स्वर्णा परमार, प्रो. मुकुल तैलंग, डॉ. नवनीत गरूड़, प्रो. संजय गुप्ता, प्रो. संजय कुलश्रेष्ठ, डॉ. मनोज अवस्थी, डॉ. जीके शर्मा, डॉ. रामशंकर, डॉ. सतेंद्र सिकरवार, डॉ. जितेन्द्र शर्मा सहित शोधार्थी एवं छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।

