14 वर्षो पुरानी जांच ग्वालियर हाईकोर्ट ने की रद्द, इन वर्षो में न नये सबूत पेश हुए न चालान बना
ग्वालियर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि पिछले 14 वर्षो में याचिकाकर्ता के खिलाफ न तो कोई चालान पेश किया गया और न ही यह बताया गया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच के लिये से नये तथ्य सामने आये है। हाईकोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14-21 के तहत समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना गया। मामला बहोड़ापुर थाना इलाके से जुड़ा है। याचिकाकर्ता आरिफ ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में तत्कालीन सीएसपी द्वारा की गयी जांच में उन्हें निर्दोष पाया गया था।
ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 14 वर्ष पुराने अपराधिक मामले में पुििलस की तरफ से की जा रही आगे की जांच को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा है कि बिनाकिसिी नये साक्ष्य के किसी व्यक्ति को वर्षो तक संदेह के दायरे में रखना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने लंबित कार्यवाहियां रद्द
याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता मिलिंद रमेश फड़के ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लेख किया है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरिफ के खिलाफ धारा 173(8) के तहत लंबित सभी कार्यवाहियों और उनसे जुड़ी परिणामों कार्यवाईयों को रद्द करने का आदेश दिया है।
2011 की रिपोर्ट में संलिप्तता नहीं पाई गई
रिकॉर्ड के अनुसार, शुरुआती जांच रिपोर्ट 22 नवंबर 2011 को पेश की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता की किसी भी प्रकार की संलिप्तता नहीं पाई गई थी। इसके बावजूद पुलिस ने धारा 173(8) के तहत आगे की जांच को वर्षों तक लंबित रखा।

