हाईकोर्ट की अवहेलना में 8 दोषियों की संपत्ति कुर्क करने आदेश, उप पंजीयक का रवैया अहंकारी
ग्वालियर. गुना में न्यायालय के अंतरिम आदेश की अवहेलना करने में मामले में हाईकोर्ट ने उप पंजीयक, क्रेता व विक्रेता सहित गवाहों को दोषी मानते हुए कड़ा रूख अपनाया है। हाईकोर्ट ने माना है कि अंतरिम आदेश का पालन नहीं किया गया है। जिस पर सभी 8 लोगों को दोषी मानते हुए उनकी संपत्ति की कुर्की करने के आदेश जारी किये है। इस कार्यवाही के लिये तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त किया गया है। संपत्ति कुर्क करने का आदेश देते वक्त हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है।
क्या है मामला
यह मामला मीरा बाई बनाम मान सिंह के बची चल रहे संपत्ति विवाद से जुड़ा है, जिसमें 6 मार्च 2014 को कोर्ट ने आदेश दिया गया था कि विवादित संपत्ति का न तो विक्रय किया जाएगा और न ही किसी प्रकार का तीसरे पक्ष का अधिकार सृजित होगा। इसके बावजूद ग्राम पुरापोसर पटवारी हल्का क्रमांक 51 तहसील व जिला गुना स्थित सर्वे नंबर 550, रकबा 0.366 हेक्टेयर भूमि का 1 मार्च 2024 को पंजीकृत विक्रय कर दिया गया। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया कि विक्रेता द्वारा जमीन बेची गई, अन्य लोगों ने सहमति व गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए और सब-रजिस्ट्रार ने लिखित आपत्ति के बावजूद दस्तावेज का पंजीयन कर दिया। कोर्ट ने माना कि अंतरिम आदेश के रहते पंजीयन करना सीधे-सीधे आदेश की अवहेलना है, क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण पंजीयन के बाद ही पूर्ण माना जाता है।
दंड के रूप में हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को कुर्क कर गुना तहसीलदार का रिसीवर नियुक्त किया है और साथ ही विक्रेता,क्रेता सहमति देने वाले, गवाह और सब रजिस्ट्रार समेत दोषी व्यक्तियों की संपूर्ण संपत्तियों को एक वर्ष के लिये या आगामी आदेश तक कुर्क करने का निर्देश दिया है। सभी को 27 जनवरी 2026 तक संपत्तियों का शांतिपूर्वक हस्तान्तरण करने और 30 जनवरी 2026 को तहसीलदार की रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी ने कुर्की की कार्यवाही में बाधा डाली तो सिविल जेल भेजे जाने का विकल्प खुला रहेगा।
आपसी समझौता की दलील खारिज
दोषियों ने यह तर्क दिया कि पक्षकारों के बीच आपसी समझौता हो चुका था। इसलिये सौदा किया गया। हालांकि न्यायालय ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई समझौता था भी तो उसे विधिवत न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर समझौता डिक्री प्राप्त करना आवश्यक था। बिना ऐसी डिक्री के अंतरिम आदेश का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा है कि उप पंजीयक का रवैया अहंकारी है। यह तर्क देना कि वह प्रकरण का पक्षकार नहीं थे और इसलिए अंतरिम आदेश से बंधा नहीं था। यह स्थिति प्रथम दृष्टया अवैध, गलत और अहंकारी रवैये को दर्शाने वाली है। राज्य का अधिकारी होने के नाते सब-रजिस्ट्रार पर यह जिम्मेदारी थी कि वह न्यायालय के अंतरिम आदेश का सम्मान करता, खासकर तब जब उसके समक्ष लिखित आपत्ति प्रस्तुत की जा चुकी थी।

