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नो वर्क नो पे- पर हाईकोर्ट ने लगाई मोहर, गैर हाजिरी अवधि में वेतन वृद्धि नहीं, भुगतान के बाद होगी रिकवरी

ग्वालियर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक अहम फैसले में ‘‘नो वर्क नो पे’’ सिद्धांत को बरकरार रखा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जिस अवधि में कोई कर्मचारी सेवा में नहीं है तो उस बीच वह वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) का हकदार नहीं होगा। न्यायालय ने यी भी कहा है कि विभाग को कर्मचारी को किये गये अधिक भुगतान की वसूली का भी हक है। यह फैसला एक हेड कांस्टेबल द्वारा दायर की गयी 2 अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करतेे हुए सुनाया।
आपको बता दें कि यह मामला रामरूप सिंह संबंधित हैं जिन्हें 1981 में एसएएफ बटालियन, ग्वालियर में कांस्टेबल के रूप में भर्ती किया गया था। अनुशासनहीनता की वजह से उन्हें 1996 में अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गयी थी और बाद में राज्य सरकार ने दया याचिका पर उनकी सजा को एक वेतन वृद्धि रोकने में बदल दिया और उन्हें 2002 में सेवा में बहाल कर दिया।
हालांकि, ‘नो वर्क नो पे’ के सिद्धांत के तहत, 1996 से 2002 तक सेवा से बाहर रहने की अवधि के लिए उन्हें कोई वेतन लाभ नहीं दिया गया था। बाद में, ट्रेजरी विभाग ने पाया कि इस अवधि के दौरान भी उनके वेतन में वेतन वृद्धि जोड़ दी गई थी और दंड की गणना भी नहीं हुई थी।
विभाग ने इसे एक त्रुटि मानते हुए वेतन का पुनर्निर्धारण किया और राम रूप सिंह से 4,41,469 रुपए की वसूली का आदेश दिया। कर्मचारी ने इस वसूली आदेश को चुनौती देते हुए दो याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।
कोर्ट का तर्क
सेवा से बाहर रहने की अवधि में इंक्रीमेंट नहीं दिया जा सकता।
दया याचिका पर सजा कम होने का अर्थ यह नहीं कि वेतन लाभ मिलेंगे।
ज्यादा भुगतान सरकारी धन है, जिसे किस्तों में वसूला जा सकता है।

 

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