कैलाश मानसरोवर का रास्ता ने चीन ने बंद कर दिया था स्वामी ने खुलवाया
नई दिल्ली. नेपाल में आये फ्लैश फ्लड ने कैलाश मानसरोवर यात्रा की मुश्किलों को फिर से खुलासा कर दिया है। इस प्राकृतिक आपदा में कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकले दर्जनों यात्रियों की मौत हो गयी है। प्राचीनकाल से सन्यासी और भक्त हिमालय के अलग-अलग दरों जैसे लिपुलेख और नाथू ला से पैदल मानसरोवर जाते थे।
कैलाश तिब्बत मे हैं और इसके ऊंचाई 22 हजार फीट है। हालांकि यह माउंट एवरेस्ट से छोटा है। लेकिन इसका धार्मिक महत्व शिखर को छूता है। चार दिशाओं से चार तरह का दिखने वाला पिरामिड आकर का यह पहाड़ न सिर्फ देखन में अद्भुत है। बल्कि हिन्दू, बौद्ध धर्म के लिये पवित्र आस्था का केन्द्र भी है।
क्यों बंद हुआ कैलाश का रास्ता
साल 1950-51 में जब तिब्बत पर चीन ने कब्जा किया तो कैलाश मानसरोवर यात्रा बन्द हो गयी। कई रिपोर्ट में बताया जाता है कि 1935 से कैलाश मानसरोवर यात्रा बंद थी। इंडियन एक्सप्रेव की एक रिपोर्ट के मुताबिक 19310 में करीब 730 भारतीय तीर्थयात्रियों ने इस पवित्र की यात्रा की थी। 1950 में तिब्बत पर के कब्जे तक तीर्थयात्रियों की संख्या सैकड़ों में ही रही। इसके बाद 1951 में कैलाश मानसरोवर यात्रा पहले यूरोपियनों के लिये और फिर 1959 में भारतीयों के लिये बन्द कर दी गयी।
सुब्रह्मणयम स्वामी भी इसी पृष्ठभूमि से एंट्री
हॉवर्ड में इकोनॉमिक्स के प्रो. सुब्रह्मणयम स्वामी की चीनी भाषा पर अच्छी खासी पकड़ थी। प्रो. सुब्रह्मणयम स्वामी कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं तब से चीन के उप प्रधानमंत्री रहे देंग शियाओ पिंग से उनकी अच्छी पटती थी। 1978 में स्वामी जनता पार्टी के सांसद थे। 1978 में वह बीजिंग गये थे। इस बीच उन्होंने देंय शियाओं पिंग कैलाश मानसरोवर की यात्रा का मुद्दा उठाया। पहली बार में तो देंग शियाओं पिंग को इस पर्वत के बारे में जानकारी हीं नहीं थी। लेकिन उन्होंने स्वामी से वादा किया िकवह इस बारें में जांच करवायेंगे। जब स्वामी 1980 में फिर ये चीन आये तो उन्हें चीन की तरफ से बताया गया कि इस जगह की सड़कें की मरम्मत औरमंदिर का काम पूरा करने के बाद इसे खोल दिया जायेगा।
अप्रैल 1981 में स्वामी देंग शियाओं पिंग से फिर से मिले। इस बार चीन के विदेश मंत्रालय ने बताया है कि यात्रा की तैयारी पूरी हो गयी है। 2 माह बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि यात्रा की तैयारी पूरी हो गयी है। एक इंटरव्यू में स्वामी ने कहा था कि चीन से हमारी बहुत दोस्ती थी। देंग शियाओं पिंग उस वक्त थे। हब नहीं है। उन्होंने मुझसे कहा है कि कुछ बताओं जो तुम्हों पंसद हो, मैं दे दूंगा, तो मैंने कहा है कि आप मानसरोवर खोल दीजिये। उन्होंने बाद में इस रूट को खोल दिया। स्वामी ने एक कार्यक्रम में इस यात्रा के बीच अपने अनुभवों को बताया था। उन्होंने चीनी सरकार ने कहा था कि इस यात्रा का पहला तीर्थ यात्री उन्हें होना पड़ेगा तो वह इस पर तैयार हो गये।
इसके बाद जुलाई 1981 में सुब्रह्मण्यम स्वामी की अगुआई में 60 तीर्थयात्रियों का दल अल्मोड़ा और लिपुलेख के रास्ते से कैलाश मान सरोवर की यात्रा के लिए रवाना हुआ। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इंटरव्यू के दौरान बताया कि देंग शियाओ पिंग ने उनसे कहा था कि वे इस यात्रा में सिर्फ हिन्दुओं को ही आने की इजाजत देंगे। क्योंकि ये हिन्दुओं का पवित्र स्थल है. स्वामी के मुताबिक देंग शियाओ पिंग ने उनसे कहा था कि वे इसे टूरिज्म के लिहाज से विकसित नहीं होने देंगे। आज यात्रा भारत सरकार द्वारा दो मार्गों लिपुलेख और नाथू ला से कैलाश मानसरोवर की यात्रा आयोजित होती है।

