भारत-ईयू डील से बैकफुट पर ट्रम्प, अचानक पलट गया सारा खेल
नई दिल्ली. भारत -ईयू डील अमेरिका के खिलाफ नहीं है। लेकिन यह साफ संदेश देती है कि अभी भारत अब किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहेगा। इसी कड़ी में स्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी ने ईयू के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को ऐतिहासिक करार दिया है। दरअसल, भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच मुक्त व्यपार समझौता (एफटीए) पर मोहर लग गयी। अगर अमेरिका के जोड़कर देखें तो आने वाले वर्षो में अमेरिका और अमेरिकी कम्पनियों मेुं इसका प्रभाव पड़ने वाला है। विशेषज्ञों ने अभी से कह रहे है कि इस डील के लागू होने के बाद भी अमेरिकी कम्पनियों के लिये भारत में कम्पटीशन बढ़ सकता है। यानी जिन अमेरिकी कम्पनियों का अीाी भारत में वर्चस्व है उसे चुनौती मिल सकती है।
दरअसल, इंडिया-ईयू डील के तहत यूरोपीय कम्पनियों को भारत में कम टैरिफ या जीरों ड्यूटी का फायदा मिलेगा। इसका सीधा प्रभाव अमेरिकी कम्पनियों पर पड़ेगा। क्योंकि अमेरिी कम्पनियों के प्रॉडक्ट्स यूरोपीय देशों के मुकाबले महंगे हो जायेंगे। खासतौर पर ऑटोमोबाइल्स, मेडीकल्स और सर्जीकल डिवाइस, केमीकल्स, हाई-एंड-मशीनरी एयरक्राफ्ट और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टरों में यूरोपीय कम्पनियों की पकड़ मजबूत होने की संभावना है।
China+1 रणनीति को झटका
अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर चीन को आगे बढ़ने नहीं देना चाहता है. इसी के तहत अमेरिका की ‘China+1 Strategy’ का उद्देश्य बड़ी कंपनियों को चीन से बाहर निकालकर भारत, वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों में निवेश के लिए उत्साहित करना है। लेकिन अब India-EU डील से यूरोपीय कंपनियां भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब और एक्सपोर्ट बेस के रूप में ज्यादा इस्तेमाल कर सकती है। इससे अमेरिकी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा और भारत एक EU-favoured manufacturing base के रूप में उभर सकता है।
जियो-पॉलिटिक्स में अचानक बदलाव
रणनीति के स्तर पर भी अमेरिका भारत के साथ डील के नाम पर एकतरफा दबाव बना रहा है, जबकि EU के साथ डील ने भारत को मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, अब भारत अमेरिका के साथ ज्यादा मोलभाव की स्थिति में है। अमेरिका को संकेत मिल गया है कि भारत धीरे-धीरे अमेरिका पर निर्भरता कम कर EU, मिडिल ईस्ट और इंडो-पैसिफिक के बीच संतुलन बना सकता है।

