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रतनगढ वाली माता के दर्शन करके शिवाजी महाराज ने मुगलों को ललकारा और सेना को किया परास्त

ग्वालियर. रतनगढ़ माता मंदिर ग्वालियर से 66 किमी दूर विराजमान है। जबकि रामपुरा गांव से 11 किमी दूर तथा दतिया से 65 किमी दूर स्थित है। यह पवित्र स्थान घने जंगल सिंध नदी के किनारे त टपर स्थित है। यहां हर साल दीवाली की दौज पर लाखों की संख्या श्रद्धालुगण दर्शन के लिये आते है।
सिंध नदी से 6 किमी दूर स्थित रतनगढ़ माता मंदिर की स्थापना करीब 600 साल पहले 17वीं सदी में हुई थी। छत्रपति शिवाजी जब बादशाह औरंगजेब की कैद में थे ।तब उनके गुरू समर्थ रामदास, रतनगढ़ माता की मडिया में 6 महीने तक रहे थे। यहीं रहकर उन्होंने शिवाजी को छुड़ाने की रणनीति बनाई थी। औरंगजेब के कैद से छूटकर शिवाजी सबसे पहले रतनगढ़ आये थे। उसी वक्त गुरू समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी द्वारा माता की मूर्ति की स्थापना की थी। मां रतनगढ़ के प्रति अंचल समेत सीमावर्ती जिलों के लाखों लोगों की आस्था जुड़ी है। प्रति सोमवार को मां के दरबार में विशाल मेला लगता है। वहीं नवरात्रि में लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन करते हैं।
रतनगढ़ माता मंदिर का इतिहास
घने जंगलों में सिंध नदी के किनारे विध्यांचल पर्वत की श्रंृखला के पवर्त पर स्थिति देवी मंदिर गवाह है कि यहां पर राजा रतनसेन ने देश धर्म की रक्षा के लिये अंतिम सांस तक मुगलों से लोहा लिया था। राजाशंकर शाह के पुत्र रतनसेन ने 13वीं शताब्दी 900 वर्ष पूर्व में अलाउद्दीन खिलजी 1296-1316 से लोहा लिया था। जिसकी वजह से पद्मावती को जौहर करना पड़ा था। रानी पद्मिनी को हासिल कर पाने में असफल अलाउद्दीन की नजर रतनगढ़ की रूपसी राजकुमार माण्डुला के सौन्दर्य पर पड़ गयी थी। उसे हासिल करने के लिये अलाद्दीन ने रतनगढ़ पर आक्रमण किया था। रतनगढ़ के राजा रतनसिंह के 7 राजकुमार और एक पुत्री थी। पुत्री अत्यंत सुन्दर थी। उसकी सुन्दरता की ख्याति से आकर्षित होकर अलाउद्दीन खिलजी ने उसे पाने के लिये रतनगढ़ की ओर सेना समेत प्रस्थान किया। घमासान युद्ध हुआ जिसमें रतनसिंह और उनके 6 बेटे मारे गये। 7वें पुत्र को बहन ने तिलक करके तलवार देकर रणभूमि में युद्ध के लिये बिदा किया। राजकुमार ने भाई की पराजय और मृत्यु समाचार सुनते ही माता वसुन्धरा से अपनी गोद में स्थान देने की प्रार्थना की। जिस प्रकार सीता जी के लिये मां धरती ने शरण दी थी। उसी प्रकार इस राजकुमार के िलये भी उसे पहाड़ के पत्थरों में एक विवर दिखाई दिया जिसमें वह राजकुमारी समा गयी। उसी राजकुमारी की यहां माता के रूप् में पूजा होती है। यहां यह विवर आज भी देखा जा सकता है। युद्ध का स्मारक हजीरा पास में ही बना हुआ है। हजीरा उस स्थान को कहते हैं जहां हजार से ज्यादा मुसलमान एक साथ दफनाये गये हों। विन्सेंट स्मिथ ने इस देवगढ़ का उल्लेख किया है। राजा रतनसेन ने अपनी बेटी की लाज एवं राजपूत गौरव की रखा के लिये संघर्ष किया था। राजा ने बेटी की रथा का भारतअ पने छोटे भाई कुंवर जूं का सौंपकर, अलाउद्दीन खिलजी का सामना किया। युद्ध में खिलजी के हजारों योद्धा मारे गये थे जिससे उसे वहां से भागना पड़ा था।
रतनगढ माता मंदिर
प्रसिद्ध रतनगढ़ माता के मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। यह मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया जिले से 63 किमी दूर मर्सेनी गांव के पास स्थित है। बीहड़ इलाका होने के कारण से यह मंदिर घने जंगल में है। इसके बगल से ही सिंध नदी बहती है। यहां अपनी मन्नतों की पूर्ति के लिये आने वाले लोग 2 मंदिर के दर्शन करते हैं। एक मंदिर है रतनगढ़ माता और दूसरा मंदिर हैं कुंवर महाराज का। मान्यताओं के मुताबिक कुंवर महाराज रतनगढ़माता के भाई है। ऐसा कहा जाता है कि कुंवर महाराज जब जंगल में शिकार करने जाते थे ।तब सारे जहरीले जानकवारी अपना विष बाहर निकाल देते थे। इसीलिये जब किसी इंसान को कोई विषैला जानवर काट लेता है तो उसके जख्म पर कुंवर महाराज के नाम का बंध लगाते है। बंध लगाने के बाद वह इंसान भाई दूज दीवाली के दूसरे दिन कुंवर महाराज के मंदिर में दर्शन करता है। यह मंदिर छत्रपति शिवाजी महाराज की मुगलों पर ऊपर विजय की निशानी है। जो कि 17वीं शताब्दी सदी में युद्ध हुआ था। छत्रपति शिवाजी और मुगलों के बीच और तब माता रतनगढ़ वाली और कुंवर महाराज ने सहायता की थी।
क्योंकि माता रतनगढ़ वाली और कुंवर महाराज ने शिवाजी महाराज के गुरू रामदास जी को पथरीगढ़़ यानी देवगढ़ के किले में दर्शन दिये थे और शिवाजी महाराज को मुगलों से फिर से युद्ध के लिये प्रेरित किया था। फिर जब पूरे भारत पर राज करने वाले मुगल शासन को सेना जब वीर मराठा शिवाजी की सेना से टकराई तो उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी। मुगल सेना को परास्त करने के बाद शिवाजी ने इस मंदिर को अपनी जीत की यादगार के रूप में बनवाया था। यह मंदिर एक विजयघोष की भी याद दिलाता है। विंध्याचल के पर्वत में होने की वजह से इस मंदिर की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। विंध्याचल पर्वत को मां दुर्गा का निवास स्थान भी माना जाता है। इस मंदिर में विराजमान माता रतनगढ़ का भक्तों में काफी महत्व है।
रतनगढ माता मंदिर में बनी थी शिवाजी को आजाद कराने की योजना
हिन्दू स्वाभिमान की रक्षा करने वाले और मराठा साम्राज्य की पताका फहराने वाले महान राजा छत्रपति शिवाजी को एक बार औरंगजे ने पुत्र सहित धोखे से बुलाकर बंदी बना लिया था। शिवाजी महाराज को आजाद कराने उनके गुरू समर्थ स्वामी रामदास और दादाकोण देव महाराष्ट से ग्वालियर के पास दतिया के रतनगढ़ माता मंदिर में आकर रहें।
शिवाजी ने रतनगढ़ माता मंदिर का कराया जीर्णोद्वार
छत्रपति शिवाजी महाराज ने रतनगढ़ माता मंदिर पहुंचकर अनुष्ठान कर माता को घंटा चढ़ाया और उसके बाद मंदिर का जीर्णोद्वार भी करवाया। शिवाजी महाराज के घंट चढ़ाने के बाद से मंदिर में घंटा चढ़ाने की परंपरा की शुरूआत हो गयी और श्रद्धालु मनोकामना पूर्ति के लिये यहां पीतल का घंटा चढ़ाने लगे। नवरात्रि के दिनों में श्रद्धालुओं के पर्वत पर, सिंध नदी के किनारे जंगल में विराजमान मां रतनगढ़ का दरबार, श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर में कई टन में घंटे चढ़ जाते हैं। विंध्यांचल पर्वत श्रृंखलाओं के पर्वत पर, सिंध नदी किनारे जंगल में विराजमान मां रतनगढ़ का दरबार, श्रद्धालुओं की आस्था से कई वर्षो से रोशन है। इस मंदिर को सिद्ध माना जाता है। इसलिये यहां मन्नतों के पूरी होने की भी चर्चायें काफी मशहूर है। यहां पर भक्त अपनी-अपनी तरह से मां को श्रद्धा प्रकट करते है। कोई नंगे पांव तो कोई जमीन पर लेट-लेटकर यहां आता है और कोई जवारे वो कर मातारानी की 9 दिन तक सेवा करते है। नवें दिन जवारे चढ़ाने पैदल कई कोशों दूर से आतें है। हर भक्त अपनी मुरादें पूर्ण कर अपने घर खुशिया लेकर वापिस लौटता है। ऐसा मां के हर भक्त का कहना है कि मईया अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करती है। मईया भक्तों की हर समस्या को दूर कर उनकी मनोकामना अवश्य पूरी करती है।
देश का सबसे बड़ा घंटा चढ़ाया था
मन्नत पूरी हने पर श्रृद्धालुओं द्वारा प्रतिवर्ष सैंकड़ों घंटे मां के दरबार में चढ़ायें जाते है। रतनगढ़ माता मंदिर पर एकत्रित हुए घंटों की पूर्व में नीलामी की जाती थी। वर्ष 2015 में जिला प्रशासन की मंशा के अनुरूप यहां पर एक़ित्रत घंटों को गलाकर विशाल घंटा बनवाकर चढ़ाया गया है। करीब 10 क्विंटल वनज के इस घंटे की नीचे की गोलाई का व्यास 13.5 इंच है। घंटा टांगने के लिये हुक के व्यास की गोलाई 1.8 इंच हें घंटे की एक ओर त्रिशूत्र दूसरी और बैल के सींग दर्शाये गये। घंटे पर 18 ऊॅं एवं 18 स्वास्तिक चिन्हित किये गये है। । पूरे घंटे का ऊपर से नीचे तक 9 रिंग बनाये गये है। रतनगढ़ माता मंदिर पर नवरात्र 16 अक्टूबर 2015 में देश का सबसे वजनी बजने वाला पीतल के घंटे का उद्घाटन सीएम शिवराजसिंह चौहान और साथ में मंत्री नरोत्तम मिश्रा के द्वारा किया गया। जिसको 9 धातुओं से मिलाकर बनवाया गया। इस घंटे की खासियत यह है कि इसको कोई भी बचा सकता है। चाहे 4 वर्ष का बालक या बालिका या फिर अस्सी साल का कोई बुजुर्ग इसका करीब वजन 2 टन, इसको लटकाने वाले पिलर करीब 3 टन के हैं। दरअसल मंदिर पर श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाने जाने वाले घंटों की मंदिर प्रबंधन कमेटी नीलामी कराती थी। कलेक्टर प्रकाश जांगरे ने घंटों की नीलाम न कराकर छोटे घंटों को मिलाकर बड़ घंटा बनवाने का निर्णय लिया ता यह कार्य ग्वालियर के मूर्तिकार प्रभातराय को सौंपा था। पहले घंटा 1100 किलो का बनवाया जा रहा था। अब इसका वजन 1935 किलो है। नवरात्र पर्व पर रतनगढ़ माता मंदिर पर श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
रतनगढ़ मेला 2022 में कब लगेगा
रतनगढ़ माता मेला कैलेंडर के अनुसार-
रतनगढ़ माता मेला 2022 – बुधवार,                   26 अक्टूबर
रतनगढ़ माता मेला 2023 – मंगलवार,                14 नवंबर
रतनगढ़ माता मेला 2024 – रविवार,                   3 नवंबर
रतनगढ़ माता मेला 2025 – गुरुवार                    23 अक्टूबर
रतनगढ़ माता मेला 2026 – बुधवार,                   11 नवंबर
रतनगढ़ माता मेला 2027 – रविवार,                   31 अक्टूबर
रतनगढ़ माता मेला 2028 – गुरुवार,                  19 अक्टूबर
रतनगढ़ माता मेला 2029 – बुधवार,                   7 नवंबर
रतनगढ़ माता मेला 2030 – सोमवार,                 28 अक्टूबर

 

 

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