Newsमप्र छत्तीसगढ़

जीवाजी विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव कुलदीप चौहान पर वित्तीय अनियमितता के आरोप, कार्यालय के बाहर लिखे गए सवाल

ग्वालियर। जीवाजी विश्वविद्यालय एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। इस बार मामला विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव कुलदीप चौहान से जुड़ा हुआ है, जिन पर वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोपों के बीच विश्वविद्यालय परिसर में विरोध का अनोखा तरीका भी देखने को मिला, जब एनएसयूआई से जुड़े छात्र नेता राजवंश द्वारा विश्वविद्यालय की दीवारों पर “कुलदीप भ्रष्ट है” जैसे नारे लिखे गए। इसके अलावा सहायक कुलसचिव के कार्यालय के बाहर काली स्याही से कथित रूप से एक चिकित्सा बिल की राशि भी लिख दी गई, जिससे पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है।
जानकारी के अनुसार विवाद का केंद्र एक चिकित्सा प्रतिपूर्ति (मेडिकल रीइम्बर्समेंट) बिल है। आरोप लगाया जा रहा है कि सहायक कुलसचिव कुलदीप चौहान ने अपनी पत्नी के इलाज के नाम पर लगभग **61,750 रुपये** की राशि नियमों के विपरीत तरीके से प्राप्त की। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से भी इस संबंध में कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
विश्वविद्यालय परिसर में पिछले कुछ दिनों से इस मामले को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। छात्र संगठनों का आरोप है कि यदि चिकित्सा प्रतिपूर्ति की प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो इसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। वहीं विरोध कर रहे छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय में वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है और किसी भी अधिकारी पर लगे आरोपों की जांच आवश्यक है।
विवाद उस समय और गहरा गया जब सहायक कुलसचिव के कार्यालय के बाहर काली स्याही से कथित बिल राशि “61,750 रुपये” लिख दी गई। परिसर में यह घटना चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस कृत्य को अनुशासनहीनता बताते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया है।
छात्र नेता राजवंश का कहना है कि विश्वविद्यालय में वित्तीय मामलों को लेकर कई सवाल लंबे समय से उठते रहे हैं और यदि किसी अधिकारी पर आरोप लगते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन कई मामलों में पारदर्शिता बरतने में विफल रहा है।
दूसरी ओर विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारियों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को जांच पूरी होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं है। उनका कहना है कि यदि किसी को किसी भुगतान या बिल के संबंध में आपत्ति है तो उसे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दस्तावेजों के साथ शिकायत प्रस्तुत करनी चाहिए।
फिलहाल पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या चिकित्सा प्रतिपूर्ति का भुगतान विश्वविद्यालय के निर्धारित नियमों के अनुरूप किया गया था या नहीं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला प्रशासनिक और वित्तीय जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है। वहीं यदि आरोप निराधार साबित होते हैं तो इससे विश्वविद्यालय के अधिकारियों की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
अब सभी की निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन और जांच एजेंसियों की संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। छात्र संगठनों ने मामले की स्वतंत्र जांच कराने और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है, ताकि विवाद पर पूरी तरह से विराम लग सके और विश्वविद्यालय की साख बनी रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

hacklink satın al