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अरबों की जमीन के दस्तावेजों स्याही फैलाकर तथ्य छिपाये, जलाश्य की जमीन को बनाया निजी, रिकॉर्ड में छेड़छाड पर लोकायुक्त की कार्यवाही

ग्वालियर. अरबों रूपये की जमीन से जुड़़े प्रकरणों में लोकायुक्त पुलिस की जांच तेज हो गयी है। गुरूवार को विशेष सत्र न्यायालय में पेश स्टेट्स रिपोट्र में लोकायुक्त पुलिस ने बताया है कि प्रकरण वर्ष 2025 में दर्ज किया जा चुका है। लेकिन अभी तक कलेक्टर ऑफिस से मांगी गयी तथ्यात्मक रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई। इस पर न्यायालय ने कलेक्टर 24 अप्रैल को प्रतिवेदन के साथ उपस्थित होने के निर्देश दिये है। मामला ललितपुर मौजे में कुलदीप नर्सर के पास स्थित जमीन का है। जो पहले नहर, बाग, सड़क और पुल जैसी सार्वजनिक उपयोग की श्रेणी में दर्ज थी। आरोप है कि बाद में इसमेंबदलाव कर इसे निजी और आवासीय उपयोग में परिवर्तित कर दिया गया है। लोकायुक्त पुलिस ने बताया है कि कलेक्टर ग्वालियर से 12 अगस्त 2025, 8 नवंबर 2025, और 8 फरवरी 2026 को रिपोर्ट मांगी गयी ।लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। इसके बाद कलेक्टर की पेशी तय की गय है। जिससे प्रशासनिक हलको मंें हलचल मच गयी है।


स्याही फैलाकर तथ्य छिपाया रिकॉर्ड में की कांटछांट
जांच के बीच पुराने राजस्व रिकॉर्ड खंगाले गये, जिसमें खसरों में कांटछांट और कूटरचना के संकेत मिल है। कुछ जगह स्याही फैलाकर मूल त्थ्यों को मिटाने का प्रयास भी सामने आया है। अहम बात यह है कि शासन स्वयं भी इस जमीन को अपनी बतो हुए सिविल कोर्ट में केस लड़ रहा है।
शिकायत के बाद बढ़ा मामला, 2005 में बदला गया लैंड यूज
इस मामले की शिकायत कैलाश अग्रवाल ने की थी। उन्होंने जमीन को खुर्दबुर्द करने का आरोप लगाया था। शुरुआती स्तर पर बयान तो दर्ज हुए, लेकिन कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी, जिसके चलते मामला जिला न्यायालय तक पहुंच गया।
मास्टर प्लान 2005 में इस जमीन का लैंड यूज जलाशय से बदलकर आवासीय कर दिया गया। रिकॉर्ड के अनुसार यहां 30 मीटर चौड़ी नहर थी, जो समय के साथ नाले में बदली और अब मौके से पूरी तरह गायब है। 2011 में सामने आई कूटरचना तत्कालीन तहसीलदार आरके पांडे ने 2011 में पुराने रिकॉर्ड का मिलान किया, जिसमें गड़बड़ी सामने आई। इसके आधार पर कुछ सर्वे नंबरों की जमीन को शासकीय घोषित किया गया। हालांकि मामला अब सिविल न्यायालय में लंबित है और मालिकाना हक का अंतिम फैसला आना बाकी है। चौंकाने वाली बात यह है कि जमीन के मालिकाना हक का विवाद कोर्ट में लंबित होने के बावजूद अधिकारियों द्वारा निर्माण की अनुमतियां जारी कर दी गईं।

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