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नरेन्द्र सिंह तोमर की पहल पर राष्ट्रीय चंबल वन्य जीव अभयारण्य की 207 हेक्टेयर भूमि का होगा डी-नोटिफिकेशन

अभयारण्य का क्षेत्र राजस्व भूमि होने से स्थानीय स्तर पर होगी रेत की उपलब्धता रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे

ग्वालियर/नई दिल्ली/ मुरैना/श्योपुर -राष्ट्रीय चंबल वन्यजीव अभयारण्य की 207.05 हेक्टेयर भूमि को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने डी-नोटिफिकेशन करने की अनुसंशा का निर्णय लिया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री व क्षेत्रीय सांसद नरेंद्र सिंह तोमर के प्रयासों से यह डी-नोटिफिकेशन होने जा रहा है। डी-नोटिफिकेशन के लिए अनुशंसा के निर्णय पर पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव का आभार माना।
डी-नोटिफिकेशन के बाद यह एरिया अभयारण्य क्षेत्र के बाहर हो जाएगा, जिससे वहां से रेत की उपलब्धता स्थानीय स्तर पर ही होगी व इस व्यवसाय में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। साथ ही स्थानीय निर्माण व विकास कार्यों के लिए रेत आसानी से सस्ते दाम पर उपलब्ध होगी।
डी-नोटिफिकेशन किए जाने के संबंध में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव से आग्रह किया था। तत्संबंधी प्रस्ताव पर 29 जुलाई 2022 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री यादव की अध्यक्षता में आयोजित राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड की स्थायी समिति की 69वीं बैठक में चर्चा की गई थी। विचार-विमर्श के बाद, स्थायी समिति ने अभयारण्य से निम्नानुसार 207.05 हेक्टेयर क्षेत्र को बाहर करने की सिफारिश करने का निर्णय लिया है। इसमें बड़ोदिया बिंदी (रेंज-सबलगढ़, जिला श्योपुर) का 9.49 हेक्टेयर, बरवासिन (रेंज-देवरी, जिला मुरैना) में 118.66 हेक्टेयर तथा राजघाट (पीपाराई) (रेंज- देवरी, जौरा, जिला-मुरैना) में 78.90 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है।
अभयारण्य क्षेत्र में पार्वती और चंबल नदियां आती हैं, जहां श्योपुर व मुरैना जिले में रेत खदान अभी तक स्वीकृत नहीं है। सामान्यतः इस क्षेत्र में भिंड जिले से सिंध नदी क्षेत्र में स्वीकृत खदान से रेत का परिवहन होता है। डी-नोटिफिकेशन होने से रेत के अवैध परिवहन पर भी अंकुश लगेगा, वहीं संरक्षित क्षेत्र के विभिन्न उत्पादों पर चार लाख से अधिक स्थानीय आबादी प्रत्यक्ष रूप से निर्भर करती है। स्थानीय स्तर पर ही रेत खनन होने से रोजगार में वृद्धि होगी।
मंत्रालय के इस आदेश में प्रशासन को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि जल क्षेत्र या जल से घिरी नदी के रेत क्षेत्र में खनन संबंधी गतिविधियां नहीं होनी चाहिए। साथ ही, पूरी प्रक्रिया- रेत-खनन, रेत-परिवहन, रेत-भंडारण एवं रेत-विपणन सुस्थापित प्रशासनिक, निगरानी एवं नियामक व्यवस्था के अंतर्गत की जाना चाहिए। रेत खनन से संबंधित संभावित अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए रेत खनन, परिवहन, भंडारण और विपणन के लिए क्षेत्र में नई नियंत्रण व विनियमन प्रणाली स्थापित करने के लिए, रेत खनन निगम लिमिटेड या मौजूदा मध्य प्रदेश खनन निगम लिमिटेड की एक शाखा स्थापित करने के लिए भी कहा गया है। मंत्रालय ने कहा है कि, अवैध खनन की निगरानी और नियंत्रण के लिए प्रौद्योगिकी, जैसे- प्रत्येक ट्रांजिट परमिट की बारकोडिंग; रॉयल्टी प्राप्तियों की बारकोडिंग; निकास बिंदुओं पर आईटी सक्षम तौल; खनन पट्टों का भू-चिह्नित सीमांकन; इलेक्ट्रॉनिक निगरानी; जीपीएस लगे ट्रैक्टर/परिवहन में शामिल ट्रक; खुदाई आदि में भारी मशीनरी का निषेध आदि का उपयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा, सीमा स्तम्भ स्थापित करके और भू-टैगिंग करके गैर-अधिसूचित क्षेत्र को भूमि पर स्पष्ट रूप से सीमांकित किया जाना चाहिए। चंबल नदी में रेत खनन और जलीय जीवों पर इसके प्रभाव के बारे में नियमित निगरानी और रिपोर्टिंग प्रणाली होनी चाहिए। जैव विविधता के नुकसान का पता लगाने के लिए अभयारण्य क्षेत्र के आसपास रेत खनन के द्विवार्षिक प्रभाव मूल्यांकन की आवश्यकता है। मूल्यांकन का वित्त पोषण राज्य एमएमडीसी/रेत खनन निगम निधि से किया जा सकता है।

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