IIT Indore ने खोजी नयी तकनीक-नई सेमीकंडक्टर चिप की डिजाइन चोरी रूकेगी, साइबर सुरक्षा के लिये वाटर मार्किंग तकनीकी पर किया काम
इंदौर. आईआईटी इंदौर की टीम ने इलेक्ट्रॉनिक मशीन और उपकरणों में लगने वाली चिप की रिवर्स इंजीनियरिंग वउसे क्लोन कर डिजाइन चौरी करने की समस्या का हल खोज निकाला है। टीम ने चिप डिजायन में डीएनए सिग्नेचर को एंबेड करने की एक अनोखी टेक्नोलॉजी बनाई गयी है। इससे अब कोई भी चिप की डिजाइन को चुरा नहीं सकेगा। यह शोध प्रतिष्ठित नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स जनरल में प्रकाशित हुआ है। इस नवाचार को लेकार आईआईटी इन्दौर के निदेशक प्रो. सुहास जोशी ने कहा कि यह तकनीक डीप टेक की मदद से दुनिया की असली समस्याओं का समाधान तलाशने के लिये हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
प्रोफेसर अनिर्बन सेनगुप्ता और ट्रांसलेशनल रिसर्च फैलो आदित्य अंशुल की टीम ने हार्डवेयर डिजाइनों की साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिये डीएनए आधारित वाटर मार्किंग तकनीक विकसित की है। यह अत्याधुनिक तकनीक मल्टीमीडिया, मेडीकल डिवाइसेस, मशीन लर्निंग और डिजीटल सिग्नल प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों उपयोग होने वाले हार्डवेयर का सुरक्षित बनाने में कारगर साबित होगी।
ये है समस्या
सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन करने और उसके उत्पाद बनाने तक की पूरी प्रक्रिया में कई कंपनियां शामिल होती हैं, जैसे आईपी वेंडर, सिस्टम ऑन चिप इंटीग्रेटर और चिप मैन्युफैक्चरर। असल में चिप डिजाइन सिर्फ आईपी वेंडर ही करता है, लेकिन जब वो अपनी चिप डिजाइन दूसरी कंपनी को देता है तो हमेशा ये आशंका बनी रहती है कि कोई गलत तरीके से उसकी चिप की डिजाइन को कॉपी न कर ले या चिप की डिजाइन पर अपना मालिकाना हक न जताए।
अकसर इसे कॉपी करने में कुछ ऐसे लॉजिक भी अनजाने में इसमें डाले जा सकते हैं, जिनकी जांच नहीं की हो। इससे असली निर्माता और ग्राहकों को खतरा हो सकता है।
ये समाधान -आईपी वेंडर की पहचान के आधार पर बनाया डीएनए जैसा यूनिक डिजिटल फिंगरप्रिंट
इसी समस्या को हल करने के लिए डीएनए फिंगरप्रिंट वाटर मार्किंग मेथड का उपयोग किया गया है। यह कम्प्यूटर-एडेड डिजाइन पर आधारित है। बायोलॉजी में जैसे हर इंसान का डीएनए अलग होता है, उसी सिद्धांत पर ये काम करती है। इस तकनीक के जरिए आईपी वेंडर की पहचान के आधार पर एक यूनिक डीएनए फिंगरप्रिंट बनाएगा, जो हार्डवेयर डिजाइन में एम्बेड होगा और एक मजबूत डिजिटल वाटर मार्क का काम करेगा। इस वाटर मार्किंग की तकनीक में डीएनए जैसे सीक्वेंस को अलग-अलग करके, उनकी प्रतिकृति बनाकर और उन्हें जोड़कर एक बेहद अनोखा डीएनए सिग्नेचर बनाने का काम किया जाता है।

