1500 वर्ष पुराना पूर्व शिवजी को दान की गयी तिरूचेंथुरई गांव की जमीन कैसे बनी वक्फ की जमीन विवाद का हिस्सा

नई दिल्ली. केन्द्र सरकार ने संसद में गुरूवार का वक्फ संशोधन बिल पेश किया गया है। वक्फ पर जारी राजनीतिक विवाद के बीच, तमिलनाडू का एक गांव भी चर्चा के केन्द्र में है। आपको बता दें कि त्रिची के श्रीरंगम निर्वाचन क्षेत्र में स्थित तिरूचेंथुरई गांव का उल्लेख केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिलू ने संसद में विधेयक पेश करते समय किया था। जब विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया। विधेयक के खिलाफ उठ रही आवाजों के बीच, एनडीए सरकार ने इसे जेपीसी को आवश्यक सिफारिशों के लिये भेज दिया था। तब अपने संबोधन में रिजिजू ने कहा था कि ‘त्रिची के तिरूचेंथुरई गांव में कई एकड़ जमीन को वक्फ बोर्ड की संपत्ति घोषित किया गया है।
2 हजार वर्ष है पुराना त्रिची के तिरूचेंथुरई का इतिहास
त्रिची के तिरूचेंथुरई गांव का यह मामला उलझा हुआ क्यों है और वक्फ की तरफ से की गयी मनमर्जी का कैसे उदाहरण् ब्न जाती है। इन सवालों का जवाब इस गांव का इतिहास देता है। समय के पहिये पर सवार होकर अगर हम लगभग 1500 वर्ष पीछे जाये तो कावेरी नदी के तटीय डेल्टा क्षेत्र के किनारे बसा यह गांव लगभग 2 हजार वष्र का लिखित इतिहास समेटे हुए है। 1500 वर्ष का जिक्र इसलिये। क्योंकि इस गांव में मौजूद पौराणिक ऐतिहासिक मनें डियावल्ली चन्द्रशेखर स्वामी मंदिर करीब इतना ही पुराना है।
ऐसा माना जाता है कि चोल शासकों ने दक्षिण विजय के बाद, जीत का श्रेय महादेव शिव के आर्शीवाद को देते हुए। उनके नाम से जमीन समर्पित करते हुए इस मंदिर का निर्माण कराया था। तिरूचेंथुरई का पौराणिक महत्व मुख्य रूप से कावेरी नदी और इसके तट पर स्थित चन्द्रशेखर स्वामी मंदिर से जुड़ा है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में कॉवेरी को एक पवित्र नदी माना जाता है। जिसकी उत्पत्ति ऋषि अगस्त्य के कमंडल से हुई थी। पुराणों के अनुसार जब एक कौवे ने ऋषि अगस्त्य के कमंडल का उलट दिया। तब कावेरी नदी का जन्म हुआ था। इस नदी के त टपर बसे गांवों को धार्मिक दृष्टि से महत्वपपूर्ण समझा जाता और तिरूचेंथुरई भी इससे अलग नहीं है।
शिव को समर्पित है चंद्रशेखर स्वामी मंदिर
चंद्रशेखर स्वामी मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित है, गांव का केंद्रीय धार्मिक स्थल है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू (प्रकृति से उत्पन्न) है. एक लोक कथा कहती है कि प्राचीन काल में एक ग्वाले को इस स्थान पर एक चमकदार पत्थर मिला, और स्वप्न में भगवान शिव ने उसे मंदिर बनाने का निर्देश दिया था. इसके अलावा, तमिल शैव भक्ति परंपरा में नयनार संतों (अप्पर, सुंदरर, संबंदर) ने कावेरी तट के शिव मंदिरों का यशोगान किया है और भक्ति भाव वाले भजन गाए है।
चोल साम्राज्य के दौरान हुआ था मंदिर का निर्माण
यह समय राजराज चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल से मेल खाता है. चोल शासक शैव धर्म के प्रबल अनुयायी थे और उन्होंने अपने साम्राज्य में अनेक शिव मंदिरों का निर्माण और संरक्षण किया. मंदिर के शिलालेखों से पता चलता है कि चोलों ने इसे भूमि और धन दान दिया था, जिससे यह स्थानीय समुदाय का धार्मिक और सामाजिक केंद्र बन गया. एतिहासिक तथ्यों की मानें तो मंदिर को राजाराजे चोल की बहन ने बनवाया था.
इस गांव का नामकरण भी मंदिर के ही नाम पर है. जिसमें तिरु का अर्थ श्री या पवित्र और चेंथुराई का अर्थ है स्थल. तीनों लोकों में सबसे पवित्र स्थल के रूप में ही इस गांव को तिरुचेंथुरई नाम मिला, जो इसे इसकी पौराणिकता से जोड़ता है और इस तथ्य को बढ़ावा देता है कि चोलों ने इस गांव की भूमि को पहले ही महादेव शिव को समर्पित किया था ।

 

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