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1.17 करोड़ रूपये का मुआवजा लेने के बाद ज्यादा मुआवजे की मांग, हाईकोर्ट बोला कि यह दोहरी नीति नहीं चलेगी, न्याय प्रक्रिया का दुरूपयोग, अपील खारिज

जबलपुर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सख्त रूप् अपनाते हुए अपील खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि एक बार आपसी सहमति से मुआवजा लेने के बाद उसे चुनौती देकर अधिक रकम मांगना स्वीकार्य नहीं है। मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने की। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि मुआवजा लेने के बाद कम पैसे मिले कहकर हाईकोर्ट आना न्यायिक प्रक्रिया का दुरूपयोग है। इससे अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है। हाईकोर्ट ने यह ीाी कहा है कि अपील बिना किसी वास्तविकता के दायर की गयी है।
पूरा मामला आधारताल तहसील का है। जहां मिलौनीगंज निवासी अजीत यादव और अन्य की जमीन का अधिग्रहण नगरनिगम जबलपुर द्वारा किया गया था। इस अधिग्रहण के बदले लगभग 1.17 करोड़ रूपये का मुआवजा आपसी सहमति से तय हुआ। संबंधित पक्षों ने बिना किसी आपत्ति के यह राशि स्वीकार कर ली है। लेकिन जैसे ही मुआवजा उनके खातों में पहुंचा, उन्होंने इसे कम बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अधिक रकम की मांग कर दी।
यह न्याय प्रक्रिया का दुरूपयोग है-हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला ‘‘दोहरी नीति’’ का उदाहरण है। जिसमें पहले फायदा लिया गया और बाद में उसी को चुनौती दी गयी। हाईकोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रियाके साथ खिलवाड़ मानते हुए अपील को सिरे से खारिज कर दिया। यदि अपील कर्ता दोबारा सुनवाई चाहते है, तो उन्हें पहले लिया गया मुआवजा वापिस करना होगा। इस पर अपीलकर्ताओं के वकील ने साफ कहा है कि उनके मुवक्किल इतनी बड़ी राशि लौटाने की स्थिति में नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने माना कि जब उन्होंने स्वेच्छा से मुआवजा स्वीकारकर लिया। अब उसे लौटाने में असमर्थ है ता वह मुआवजे की अपर्याप्तता पर सवाल नहीं उठा सकते है।
सरकार ने कहा समझौता अंतिम होता है
शासन की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि एक बार मुआवजा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वह अंतिम माना जाता है और उसे बाद में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता एक साथ मुआवजे का लाभ लेकर उसी को चुनौती नहीं दे सकते, क्योंकि यह कानून की नजर में दोहरी नीति मानी जाती है।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि जमीन में अन्य लोगों का भी हिस्सा था, जिसकी जानकारी छिपाकर मुआवजा हासिल किया गया। इंटरविनर की ओर से यह आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ताओं ने अन्य हिस्सेदारों के अधिकारों की अनदेखी करते हुए पूरी राशि खुद ले ली। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी पुरानी याचिकाओं की जानकारी भी कोर्ट से छिपाई, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।

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