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2 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ बायोटेक्नोलॉजी ने कृषि और अन्य क्षेत्रों में क्रांति है: डॉ.मनमोहन पारिडा

विज्ञान हम सब के लिए बहुत महत्वपूर्ण है: प्रो.जूलियन ग्रोस
परंपरागत ज्ञान से प्रकृति का संरक्षण किया जा सकता है: डॉ. राजकुमार आचार्य 
ग्वालियर। बायोटेक्नोलॉजी का योगदान वैक्सीन और दवाईयां बनाने में है।बायोटेक हमारे पर्यावरण में कार्बन रिड्यूस करने में मदद करती है और फोटोसिंथेसिस करने में भी काम आती है। डीआरडीओ ने बहुत से रिसर्च संस्थान में निवेश किया है। जिससे बहुत अच्छे परिणाम निकलेंगे।हम एक दुसरे का सहयोग करें न कि एक दूसरे से मुकाबला करें। बायोटेक्नोलॉजी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत रिसर्च एवं डेवलपमेंट पर काफी ध्यान दिया है। हमने विकास एवं शोध के लिए 50 करोड़ रखे हुए हैं। आज की परिस्थितियों की मांग है कि हम साथ मिलकर काम करें जिससे हम आने वाली चुनौतियों से निपट सकें।बायोटेक्नोलॉजी ने कृषि और अन्य क्षेत्रों में क्रांति ला दी है। यह बात शुक्रवार को डीआरडीओ के निदेशक डॉ. मनमोहन पारिडा ने पीएम ऊषा के तहत बायोटेक्नोलॉजी अध्ययनशाला द्वारा ‘मानव स्वास्थ्य के लिए पादप जैव प्रौद्योगिकी और फेज चिकित्सा में नवाचार’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि कही।प्रो. समीर भाग्यवंत के स्वागत भाषण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
कार्यक्रम के दौरान स्मारिका का विमोचन किया गया। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो.जूलियन ग्रोस ने कहा कि हमको यहां आकर बहुत अच्छा लगा। यहां आकर आप सब ने हमारा बहुत अच्छा स्वागत किया।हम यहां 3 साल पहले भी आए थे। उस समय भी हमने बहुत सी रिसर्च की थी। विज्ञान हम सब के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हमने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा। हम दो दिन से 18 शोधार्थियों के साथ चंबल नदी के पानी से बैक्टीरियोफेज को आइसोलेट कर उनका डीएनए परीक्षण कर रिसर्च कर रहे हैं। इससे बहुत अच्छे निष्कर्ष निकलकर सामने आएंगे।जो मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी होंगे।अब हम एमओयू साइन करके रिसर्च को आगे बढ़ाएंगे। जेयू के कुलसचिव डॉ.राकेश कुशवाह ने कहा कि इस कार्यक्रम में पीएम ऊषा का बहुत बड़ा योगदान है।हमारे छात्रों के लिए यह कार्यक्रम बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
दो दिवसीय आयोजन से जो भी निष्कर्ष निकलेगा वह ग्वालियर और देश के हित में होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जेयू के कुलगुरू डॉ. राजकुमार आचार्य ने कहा कि पौधों में मौजूद प्राकृतिक कंपाउंड से नए औषधीय संरचना बनाकर मानव स्वास्थ्य में इनका उपयोग किया जा सकता है।परंपरागत ज्ञान को हमने रीति मान लिया है। यह प्रकृति का संरक्षण है। हम पीपल- तुलसी को ऐसे ही नहीं पूजते। हमने इसको धार्मिक पद्धति से जोड़ दिया है।वर्तमान में सबको साथ लेकर चलने की आवश्यकता है। हाइब्रिड खाना जो हम खा रहे हैं वह मानव के लिए बहुत खतरनाक है।अब हम सर्वांगीण विकास की बात करेंगे।
कार्यक्रम के दौरान सभी अतिथियों को शाल श्रीफल व स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के दौरान तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। जिसमें शोधार्थियों ने शोध पत्र पड़े।इस अवसर पर, प्रो डीएन गोस्वामी, प्रो.वायके जायसवाल, प्रो.समीर भाग्यवंत, प्रो.जेएन गौतम, प्रो.विवेक बापट, प्रो.डीसी गुप्ता, प्रो.मुकुल तैलंग, प्रो.एमके गुप्ता, प्रो.एसके सिंह, प्रो.एसएन महापात्र, प्रो.हेमन्त शर्मा, प्रो.राजेन्द्र खटीक, प्रो.शान्तिदेव सिसोदिया, प्रो.गणेश दुबे, प्रो.नवनीत गरूड़, डॉ.सपन पटेल, डॉ.सुमन जैन, डॉ.स्वर्ण परमार, डॉ.विमलेंद्र सिंह सहित शोधार्थी व छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
जेयू और ब्रिंघम यंग यूनिवर्सिटी के बीच किया गया एमओयू:
ब्रिंघम यंग यूनिवर्सिटी यूएसए और जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर के बीच एमओयू किया गया।जिसमें जीवाजी विश्वविद्यालय के छात्र छात्राएं एवं रिसर्च स्कॉलर ब्रिंघम यंग यूनिवर्सिटी जाकर नवीनतम बायोटेक्नोलॉजी विषय पर रिसर्च कर सकते हैं। जिससे रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा।

 

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