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रिसर्च-गिलोय के अर्क से डायबिटीज का इलाज संभव

रिसर्चः जेयू की बायोकेमिस्ट्री की शोध -टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया (गिलोय) के अर्क से किया जा सकेगा मधुमेह का उपचार

ग्वालियर। जीवाजी विश्वविद्यालय की बायोकेमिस्ट्री की शोध छात्रा प्रीति दुबे व प्रोफेसर नलिनी श्रीवास्तव ने अपने शोध में टीनोस्फोरा कॉर्डीफोलिया (गिलोय) से अर्क तैयार किया है जो मधुमेह के उपचार में लाभकारी होगा । उन्होंने बताया कि मधुमेह आधुनिक युग का बहुत ही तेजी से बढ़ता हुआ रोग है। जो विकसित एवं विकासशील देशों में समान रूप से फैल रहा है। कुछ समय पूर्व तक यह रोग विकसित देशों में ज्यादा पाया जाता था परंतु अब यह सीमा समाप्त हो गई है एवं शहरों व गांवों में,विकसित व विकासशील देशों में समान रूप से फैल रहा है। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि यह रोग बच्चों को भी अपनी गिरफ्त में ले रहा है। भारत में मधुमेह अथवा डायबिटीज के मरीजों की लगातार बढ़ती संख्या बताती है कि स्थिति भयावह स्तर पर पहुंच गई है। चीन के बाद भारत दूसरा देश है जिसमें डायबिटीज के रोगी बड़ी संख्या में मौजूद है।इस रोग का संपूर्ण निदान तो संभव नहीं है परंतु विभिन्न तरीकों से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। जिसमें दवाईयां,नियमित दिनचर्या, खानपान में परहेज, व्यायाम,योग व जीवनशैली में सुधार इत्यादि प्रमुख है।आधुनिक युग में डायबिटीज को नियंत्रित करने की एलोपैथिक दवाईयां ज्यादा प्रचलित है जिनका साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा होता है। अतः इन दवाईयों के स्थान पर विभिन्न बीमारियां जिसमें मधुमेह भी शामिल है का निदान हर्बल उपचार द्वारा किए जाने पर ज्यादा भरोसा जताया जा रहा है।भारतवर्ष में आयुर्वेद चिकित्सीय पध्दति में गिलोय का उपयोग प्राचीनकाल से होता आया है।
उन्होंने बताया कि लैब में चूहों पर डायबिटीज इम्यून करा कर इन पर कई प्रकार के प्रयोग किए गए हैं। इसमें टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया जो कि बहुत सारी बीमारियों के उपचार में उपयोग होता है, का प्रभाव डायबिटीज पर देखा गया है। यह पाया गया है कि 2 से 3 सप्ताह तक गिलोय का अर्क पिलाने से रक्त की शर्करा के स्तर में सुधार होने लगता है एवं कुछ समय में यह सामान्य हो जाता है।इससे इम्‍युनिटी बेहतर होती है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सिडेंट तत्व हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करते हैं।गिलोय के एक्स्ट्रैक्ट से लिवर व किडनी में होने वाले डायबिटीज के दुष्प्रभावों में भी सुधार देखा गया है। एवं लंबे समय तक इस एक्स्ट्रैक्ट के सेवन से इन आंतरिक अंगों को सामान्य रूप से कार्य करने में मदद मिलती है।गिलोय का नियमित सेवन इन्सुलिन हार्मोन के स्तर को सामान्य रखने में सहायक होता है। इन्सुलिन हार्मोन का स्त्राव व क्रियाशीलता मधुमेह के रोगियों में कम हो जाती है।गिलोय में पाए जाने वाले रसायन शरीर में अन्य अंगों को सामान्य रखने में सहायक होते है । चूहों पर किए गए प्रयोगो से यह भी पता लगता है कि गिलोय का नियमित सेवन शरीर में बढ़े हुए शर्करा स्तर से होने वाले दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने में सहायक होता है। उदाहरणतः ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करना, लिवर व किडनी को सामान्य रखना, विभिन्न प्रकार की न्यूरोपैथी को सामान्य रखना प्रमुख है।
जेयू की बायोकेमिस्ट्री की प्रोफेसर नलिनी श्रीवास्तव का कहना है कि मधुमेय के लिए लोग तरह तरह की एलोपैथी दवाईयों का उपयोग करते हैं जो व्यक्ति की किडनी और लिवर के लिए बहुत ही हानिकारक है। गिलोय के एक्स्ट्रैक्ट से मधुमेह के उपचार में सुधार पाया गया है।इसका प्रयोग चूहों पर किया गया है। इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है।
शोध छात्रा प्रीति दुबे ने बताया कि प्राकृतिक तरीके से मधुमेह का उपचार किया जा सकता है। लगातार 2 से 3 सप्ताह तक गिलोय का अर्क पिलाने से मधुमेह में लाभ मिलेगा। इसका शरीर पर कोई दुष्प्रभाव भी नहीं पड़ेगा।इसके साथ ही यह शरीर के अन्य अंगों के लिए भी लाभदायक है।

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