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मगरमच्छों के पेट में मिले घडि़यालों के ट्रांसमीटर से हुआ खुलासा, अधिकारी ढूंढ रहे उपाय

चंबल सेंचुरी में मगरमच्छ, घड़ियालों का शिकार कर रहे हैं। - Dainik Bhaskar

ग्वालियर. मध्यप्रदेश में घडि़यालों पर सीधा हमला हो रहा है। जिस नदी को देश में घडि़यालों का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता रहा है। वहीं अब उनके बच्चों की जान खतरे में है। 435 किमी दूर तक फैले चम्बल घडि़याल सेंचुरी की हालिया निगरानी में खुलासा हुआ है। 3 वर्षो तक के लिये लगभग 120 सेंटीमीटर लम्बे घडि़याल लगातार मगरमच्छों के हमले का शिकार हो रहे है। वन विभाग की गो एंड रिलीज योजना के तहत घडि़यालों पर लगाये गये रेडियो ट्रांसमीटर से इसकी पुष्ठि हुई है। ट्रांसमीटर वही सलामत मिले। लेकिन उनकी लोकेशन नदी में नहीं, बल्कि मगर मच्छों के पेट से ट्रेस हुई। जांच आगे बढ़ी तो मगरमच्छ के मल में घडियाल के अवशेष मिलने से इस पर मुहर लग गयी है। चम्बल घडियाल सेंचुरी में पहली बार इसे आधिकारिक तौर पर दर्ज किया है। मुरैना से भोपाल तक अधिकारियों की टीमें अब यह पता लगाने में जुटी है। आखिर घडि़यालों का सबसे सुरक्षित गढ़ कैसे उनकी शिकारगाह बनता जा रहा है।
मगरमच्छों के पेट में मिला ट्रांसमीटर
जलीय जीव विशेषज्ञ ज्योतिप्रसाद दंडोतिया के मुताबिक चम्बल सेंचुरी में घडियाल की संख्या जिस अनुपात में बढ़नी चाहिये थी। वह नहीं बढ़ सकी। इसकी बड़ी वजह है कि चम्बल में आने वाली बाढ़ के दौरान घडि़यालों के सिर्फ 3 प्रतिशत बच्चे ही जीवित रह पाते हैं। इसके अलावा वयस्क मगरमच्छ 3 साल तक के घडि़यालों को अपना शिकार बना रहे हैं। इस बात का खुलासा एमसीबीटी (मद्रास क्रोकोडायल बैंक ट्रस्ट) की रिपोर्ट में भी हुआ है। संस्थान द्वारा चम्बल नदी में छोड़े गये घडि़यालों पर रेडियो टेलीमेट्री ट्रांसमीटर लगाये गये थे।ज ब इनकी लोकेशन ट्रेस की गयी तो कई ट्रांसमीटर एडल्ट मगरमच्छों के पेट के भीतर मिले। इससे यह स्पष्ट हुआ है कि मगरमच्छ लगातार छोटे घडि़यालों पर हमला कर रहे है।
1978-79 में बनी थी घड़ियाल सेंचुरी
देश में घड़ियालों के सुरक्षित संरक्षण के लिए जब नदियों का अध्ययन किया गया, तो चंबल नदी को सबसे स्वच्छ और अनुकूल पाया गया। साफ पानी और उपयुक्त प्राकृतिक वातावरण में ही घड़ियाल बेहतर तरीके से जीवित रह पाते हैं। इसी आधार पर 1978-79 में मुरैना जिले के देवरी गांव के पास देवरी घड़ियाल सेंचुरी की स्थापना की गई।यह घड़ियाल सेंचुरी कुल 435 किलोमीटर तक फैली है। यहां घड़ियालों के संरक्षण के लिए वन विभाग लंबे समय से लगातार काम कर रहा है। 2025 की गणना के अनुसार, सेंचुरी में घड़ियालों की संख्या बढ़कर 2462 तक पहुंच गई है।जबकि सेंचुरी की स्थापना के बाद 1978-79 में चंबल नदी में 75 घड़ियाल छोड़े गए थे। तुलना करें तो बिहार की गंडक नदी में लगभग 400 और नेपाल के कोसी (कटनकिया घाट) क्षेत्र में भी करीब 400 घड़ियाल ही हैं। इन नदियों की तुलना में चंबल नदी का वातावरण घड़ियालों के लिए सबसे अनुकूल साबित हुआ है, जहां उनकी संख्या तेजी से बढ़ी है।

 

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