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ग्वालियर में 125 करोड़ फूंके फिर भी प्रदूषण घटाने के तमाम दावे फेल, नॉन-अटेनमेंट सिटी घोषित

ग्वालियर. प्रदूषण कम करने के नाम पर नगर निगम 125 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च, दर्जनों योजनाएं, मशीनें, सडक़ें, पार्क और फाउंटेन, लेकिन नतीजा जीरो। यही वजह है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सेंट्रल ज़ोन बेंच ने ग्वालियर को नॉन-अटेनमेंट सिटी घोषित कर दिया है। यानी वह शहर, जो पिछले पांच वर्षों से लगातार वायु गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतर पाया। ग्वालियर अकेला नहीं है। उसके साथ भोपाल, इंदौर, जबलपुर, सागर, उज्जैन, देवास और सिंगरौली को भी नॉन-अटेनमेंट सिटी की सूची में डाला गया है, लेकिन सवाल यह है कि इतने भारी-भरकम खर्च के बाद भी ग्वालियर की हवा क्यों नहीं सुधरी है।
कागजों में सफाई, ज़मीन पर प्रदूषण
नगर निगम और प्रशासन ने प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर योजनाओं की लंबी फेहरिस्त तैयार की, लेकिन इनमें से अधिकतर काम या तो दिखावटी रहे या फिर गलत प्राथमिकताओं पर आधारित। पांच साल में शहर की हवा पीएम 10 और पीएम 2.5 के मानकों पर बार-बार फेल होती रही, इसके बावजूद जिम्मेदार अफसर खर्च गिनाते रहे, रिजल्ट नही।
किस काम पर कितना खर्च और क्या मिला बदले में
5 रोड स्वीपिंग मशीनें 4.50 करोड़, 28 इलेक्ट्रिक टिपर 1.76, 8 फॉगर मशीनें 4, 50 किमी सीसी रोड 30.99 करोड़ सहित अन्य प्रोजेक्ट 24.96 करोड़ बावजूद इसके, धूल उड़ती रही, कचरा फैला रहा और एक्यूआई खतरनाक स्तर पर पहुंचता रहा है।
सडक़, पार्क और फाउंटेन पर हवा सुधरी नहीं
रेसकोर्स रोड निर्माण 3 करोड़, पटेल नगर सडक़ 2.50 करोड़, चेतकपुरी, पूर्व व ग्वालियर विधानसभा में इंटरलॉकिंग टाइल्स 10 करोड़ से अधिक, गांधी पार्क और अन्य स्थानों पर वाटर फाउंटेन करीब पांच करोड़, कम्पू मल्टी लेवल पार्किंग 3.76 करोड़ भी खर्च किए पर हवा नहीं सुधरी।

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