हमास ने इजराइल में मचाई तबाही, बॉर्डर पर हिजबुल्लाह के लड़ाके, घुसपैठ के लिये तैयार तालिबान, इजराइल पर तीनों ओर हमले का खतरा
नई दिल्ली. इजराइल पर हमास का हमला कोई मामूली हमला नहीं था। बल्कि यह हमास की ओर से इजराइल पर किया गया अभी तक का सबसे बड़ा हमला है। इस हमले ने इजराइल की खुफिया एजेंसी मौशाद को भी नाकाम कर दिया। इजराइल ने इस हमले के जवाब में पलटकर हमास पर हमला किया है। गाजा पट्टी में बड़े पैमाने पर इजराइली सेना ने हवाई हमला किया है।
गाजा पट्टी ही हमास का केन्द्र माना जाता है। यही वह इलाका है। जिसे लेकर इजराइल और फिलिस्तीन के बीच कई वर्षो से संघर्ष होता है। इब इस ताजा हमले के बाद हालात यह है कि एक ओर तो हिज़्बुल्लाह लेबनान के लड़ाके बॉर्डर पर जुटे हैं। वहीं, दूसरी और तालिबान भी फिलिस्तीन की मदद के लिये जाना चाहता है। ऐसे में इजराइल पर ट्रिपल खतरा मंडरा रहा है।
हमास, हिज़्बुल्लाह लेबनान और तालिबान यह सभी ऐसे संगठन हैं। जिन्हें कई देशों ने मान्यता दी है तो कई मुल्कों ने इन्हें आतंकी संगठन बताकर बैन लगा रखा है। हालांकि यह इन तीनों संगठनों में हिज़्बुल्लाह के हालात अब पहले जैसे मजबूत नहीं है। लेकिन ईरान की मेहरबानी से यह संगठन आज भी सक्रिय है।
क्या है इन तीनों संगठन कहानी

क्या है हमास?
इजरायल पर हमला करने वाले हमास पर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है. ये वही हमास है, जिसका गाजा पट्टी पर कब्जा है. हमास इजराइल का खात्मा चाहता है. इसी वजह से इजराइल और हमास के बीच कई बार झड़पें हो चुकी हैं. हमास इजराइल के कब्जे वाले वेस्ट बैंक और अल अक्सा मस्जिद को आजाद कराना चाहता है. इजराइल जैसे मजबूत देश को घुटनों पर लाने वाला हमास कैसा इतना ताकतवर बन गया. इसकी वजह उसे मिलने वाली फंडिंग है. हमास को दुनिया के कई मुल्क सपोर्ट करते हैं. जिसमें सबसे अहम है ईरान और तुर्की. ये दोनों देश हमास को पैसे और हथियारों से मदद पहुंचाते हैं. हमास के पास घातक मिसाइलों का जखीरा भी हैं. हमास कोई संगठन नहीं, बल्कि एक आंदोलन है. जिसका मतलब है इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन. इसकी स्थापना 1987 में पहले फ़िलिस्तीनी इंतिफ़ादा के दौरान हुई थी. इंतिफादा का मतलब बगावत या विद्रोह करना होता है. हमास के नेता कतर सहित मध्य पूर्व के कई देशों में फैले हुए हैं. हमास को ईरान के साथ-साथ कई देशों का समर्थन हासिल है. इसकी विचारधारा मुस्लिम ब्रदरहुड की इस्लामी विचारधारा से मेल खाती है, जिसे 1920 के दशक में मिस्र में स्थापित किया गया था.

क्या है हिजबुल्लाह?
इस संगठन के लड़ाके इजराइल बॉर्डर के बाहर जमा हो रहे हैं. उन्हें बस हुक्म मिलने का इंतजार है. ताकि वे हमास के समर्थन में इजरायल पर हमला कर सकें.
हिजबुल्लाह लेबनान का एक शिया राजनीतिक और अर्द्धसैनिक संगठन है. हिजबुल्लाह लेबनान के नागरिक युद्ध के दौरान स्थापित किया गया था. हिजबुल्लाह के नेता हसन नसरूल्लाह हैं. साल 1982 में इजराइल ने जब दक्षिणी लेबनान पर हमला किया था, तब ये संगठन वजूद में आया था. हालांकि इसे आधिकारिक रूप से साल 1985 माना जाता है. इस संगठन को लेबनान के संविधान के तहत मान्यता प्राप्त है, जिसने इजरायल के बढ़ते खतरे के चलते अपने देश को इजरायल के कब्जे में जाने से बचाया था.

कौन है तालिबान?
तालिबान लड़ाके भी कुछ देशों से उन्हें रास्ते देने की इजाजत मांग रहे हैं, ताकि वे जंग में इजरायल के खिलाफ हमास का साथ दे सकें. आपको बता दें कि अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों की वापसी के बाद 1990 के दशक की शुरुआत में उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान का उभार हुआ था. पश्तो भाषा में तालिबान का मतलब होता है छात्र खासकर ऐसे छात्र जो कट्टर इस्लामी धार्मिक शिक्षा से प्रेरित हों. कहा जाता है कि कट्टर सुन्नी इस्लामी विद्वानों ने धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से पाकिस्तान में इनकी बुनियाद खड़ी की थी. तालिबान पर देववंदी विचारधारा का पूरा प्रभाव है. तालिबान को खड़ा करने के पीछे सऊदी अरब से आ रही आर्थिक मदद को जिम्मेदार माना गया था. शुरुआती तौर पर तालिबान ने ऐलान किया कि इस्लामी इलाकों से विदेशी शासन खत्म करना, वहां शरिया कानून और इस्लामी राज्य स्थापित करना उनका मकसद है. शुरू-शुरू में सामंतों के अत्याचार, अधिकारियों के करप्शन से आजीज जनता ने तालिबान में मसीहा देखा और कई इलाकों में कबाइली लोगों ने इनका स्वागत किया लेकिन बाद में कट्टरता ने तालिबान की ये लोकप्रियता भी खत्म कर दी लेकिन तब तक तालिबान इतना पावरफुल हो चुका था कि उससे निजात पाने की लोगों की उम्मीद खत्म हो गई.

