रामनवमी के मौके कोलकाता के कारीगरों ने संजाया रामराजा मंदिर, दूधिया रोशनी में नहाया मंदिर
निवाड़ी. ओरछा का रामराजा मंदिर रामनवमी के लिये तैयार हो रहा है। मंदिर को फूलों से संजाया जा रहा है। इस बार की सजावट पहले से अधिक भव्य होगी। दिल्ली से 2 ट्रक फूल मंगाये गये है। कोलकाता से 10 से ज्यादा माहिर कारीगर सजावट के लिये बुलाये गये है। एक दिन पहले यानी कि शनिवार की रात मंदिर पर खूबसूरत लाइटिंग की गयी है।
मंदिर का इतिहास
मंदिर की स्थापना बुंदेला शासक राजा मधुकर शाह (1554-1592) की रानी कुंवर गणेश के प्रयासों से हुई थी। रानी, जो भगवान राम की भक्त थीं, अयोध्या से श्रीराम की मूर्ति ओरछा लाई थीं। कहानी के अनुसार, रानी ने अयोध्या में भगवान राम से प्रार्थना की कि वे ओरछा चलें। भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उनके साथ ओरछा आए। रानी ने उन्हें अपने महल के रसोई घर में अस्थायी रूप से स्थापित किया। बाद में, जब चतुर्भुज मंदिर में मूर्ति को स्थापित करने का प्रयास किया गया, तो मूर्ति अपने स्थान से हिली नहीं। इस घटना को दिव्य संकेत मानकर, महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया, जो आज रामराजा मंदिर के नाम से जाना जाता है।
मंदिर की विशेषताएं
राजा के रूप में पूजा: भगवान राम को यहां राजा के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में दिन में 4 बार आरती होती है, जिसमें भगवान को सशस्त्र सलामी दी जाती है। यह परंपरा राजा मधुकर शाह के समय से चली आ रही है।
सशस्त्र सलामी: भगवान राम को राजा मानकर, उन्हें पुलिसकर्मियों द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। यह परंपरा मंदिर की विशिष्टता को दर्शाती है।
त्योहारों का आयोजन: राम नवमी, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, शिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा और विवाह पंचमी जैसे त्योहारों पर मंदिर में विशेष आयोजन होते हैं, जिनमें हजारों भक्त शामिल होते हैं।
मंदिर की महिमा
स्थानीय निवासियों के लिए रामराजा मंदिर का विशेष महत्व है। यहां किसी भी शुभ कार्य या विवाह का पहला निमंत्रण भगवान राम को दिया जाता है। यह परंपरा मंदिर और भगवान राम के प्रति गहरी श्रद्धा को दर्शाती है।
यात्रा जानकारी
ओरछा, झांसी से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित है और सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर में दर्शन का समय प्रातः 8 बजे से रात्रि 10:30 बजे तक है, जिसमें विभिन्न आरती सत्र शामिल हैं।

