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कोर्ट ने एजी आफिस पुल की जमीन प्रथम दृष्टया सिंधिया ट्रस्ट की नहीं मानी

ग्वालियर . अपर सत्र न्यायालय ने उस दावे की सुनवाई की, जिसमें केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कमलाराजे चैरिटेबल ट्रस्ट (वादी) ने शहर के एजी आफिस पुल की जमीन का 7.55 करोड़ मुआवजा मांगा है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया पुल की जमीन को शासकीय मानते हुए स्थगन (स्टे) के आवेदन को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने ट्रस्ट के मूल दावे का जवाब देने के लिए शासन-प्रशासन को 16 मार्च तक का समय दिया है, इस दिन फिर मामले की सुनवाई होगी।

सिंधिया ट्रस्ट ने यह दिया तर्क
सिंधिया के ट्रस्ट की ओर से तर्क दिया गया था कि शासन ने उनकी जमीन पर अतिक्रमण करके पुल बना दिया है, इसलिए पुल व पास में खाली पड़ी जमीन पर स्थगन दिया जाए। सुनवाई में प्रशासन की ओर से अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता धर्मेंद्र शर्मा व अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता जगदीश शाक्यवार उपस्थित हुए। उन्होंने तर्क दिया कि मिसिल बंदोबस्त 1950 के आधार पर जमीन का मालिकाना हक तय होता है। यह जमीन कभी भी ट्रस्ट की नहीं रही है, न ट्रस्ट काबिज रहा है। वर्तमान तीनों सर्वे नंबर की जमीन पर पुल व सड़क बनी है। महलगांव के सर्वे क्रमांक 1071, 1072, 1073 खसरों में शासकीय दर्ज हैं। जमीन का उपयोग लोकहित में किया जा रहा है। वर्ष 1991 में पुल बन गया था, जिसका उपयोग शहर की जनता के आवागमन में हो रहा है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद स्थगन आवेदन खारिज कर दिया। ज्ञात हो कि मिसिल बंदोबस्त संवत 1997 सर्वे क्रमांक 1071 में 10 विश्वा जमीन, 1072 में एक बीघा चार विश्वा जमीन, 1073 में चार बीघा जमीन रेल की पटरी, सड़क, बंजर के नाम से दर्ज है। इस दावे में प्रशासन की ओर से पैरवी के लिए तीन अधिवक्ता बदल दिए थे।

 

 

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