आयुर्वेद चिकित्सालय परिसर में हुई धनवंतरि की पूजा अर्चना
ग्वालियर. 9वां राष्ट्रीय दिवस एवं धनतेरस पूर्व के मौके पर आमखो स्थित शासकीय स्वशासी आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय परिसर में हर वर्ष की भंति धनतेरस की सुबह 11 बजे धनवतंरि की पूजा अर्चना की गयी है। इस मौके पर प्राधानाचार्य के साथ-साथ पूरा स्टाफ मौजूद था। सभी धनवंतरि की पूजा अर्चना की है।
आपको बता दें कि बीमारियों से शरीर को बचाने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा पद्दति का उद्गम किया। कहा जाता है कि भगवान धन्वंतरि ने प्रकृति में पैदा होने वाली जड़ी बूटियों व पेड़ पौधों के फायदे के बारे में मानव को बताया। पेड़ पौधों से किन किन रोगों का उपचार किया जा सकता है। किस किस जड़ी बूटी से कौन कौन से रोगों को हराया जा सकता है। आयुर्वेद के चिकित्सकों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए जीवनशैली सही रखें। एक हाथ में अमृत कलश हैए जो संदेश देता है कि जल ही जीवन हैए जल की महत्ता समझें और शरीर की आवश्यकता के अनुसार उसका सेवन करें। दूसरी भुजा में गिलोय औषधि हैए जिससे संदेश मिलता है कि हर जड़ी.बूटी का अपना महत्व हैए उनका सेवन करने के साथ सम्मान भी दें। तीसरी भुजा में शंख धारण किया हुआ हैए जो हमें पवित्रता का संदेश देता है। जिस तरह पूजा घर में शंख का उपयोग होता है जिसकी ध्वनि मात्र से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।ए शंख की तरह ही हमारा शरीर पवित्र होना चाहिए। चौथी भुजा में आयुर्वेद ग्रंथ के माध्यम से संदेश देते हैं कि हर बीमारी का इलाज आयुर्वेद में हैं। आयुर्वेद ग्रंथ का अध्ययन करके शरीर को निरोगी रखें।
आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि की पूजा दीपावली से पहले घर घर की जाती है। लोग पूजा अर्चनाकर भगवान धन्वंतरि से अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं और घर में दीपक जलाते हैं। जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो। दीपक का प्रकाश घर में प्रकाश लेकर आए और बीमारियों को दूर भगवाए। देवता और राक्षसों ने जब समुद्र मंथन किया था, तब भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर अवतरित हुए थे। उनका अवतरण कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हुआ था, इसलिए धनतेरस पर उनकी पूजा की जाती है। भगवान धन्वंतरि चंद्र प्रधान हस्तनक्षत्र और अमृत योग में अमृत से भरा चन्द्र कलश लेकर प्रकट हुए थे। चन्द्र प्रधान नक्षत्र का संबंध चांदी से है, इसलिए धनतेरस पर चांदी की खरीदी की जाती है।

