जीवाजी विश्वविद्यालय परिसर स्थित भगवान भोले नाथ मंदिर पर मनाया गया नवसंवत्सर
ग्वालियर. मंगलवार को हिन्दू नववर्ष या नवसंवत्सर को मॉर्निंग वॉकर ग्रुप के द्वारा जीवाजी विश्वविद्यालय परिसर स्थित भगवान भोलेनाथ के मंदिर में बड़े धूमधाम से मनाया गया है। इस आयोजन के लिये फलाहारी खिचडी और मिष्ठान के अलावा आयोजना की व्यवस्था प्रो. राजकुमार तिवारी के व्यवस्था की गयी थी। इस मौके पर भगवान भोलेनाथ के मंदिर संजय बनवारियों द्वार भोग अर्पित करने के उपरांत प्रसादी के रूप मिष्ठान और फलाहारी खिचड़ी का पंडित राजकुमार तिवारी, संजय सक्सैना, हिमेश दंडोतिया, अजीत जैन, आरआई होतम सिंह यादव और संजय बनवारिया के द्वारा प्रसादी का वितरण किया गया।
नवसंवतत्सर का क्या है महत्व
हिन्दू नववर्ष या नवसंवत्सर हिन्दू पंचांग के अनुसार नये वर्ष की शुरूआत को दर्शाता है। यह मुख्य रूप से चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है। इसे विक्रम संवतः शक संवत या विभिन्न क्षेत्रीय नाम से भी जाना जाता है।
नवसंवत्सर के प्रकार
विक्रम संवत – इसकी शुरूआत 57 ईसा पूर्व में सम्राट विक्रमादित्य ने की थी। यह भारत में प्रचलित संवत्सरों में सबसे प्राचीन है।
शक संवत- इसकी शुरूआत 78 ईस्वी में राजा शालिवाहन ने की थी। इसे भारत सरकार द्वारा आधिकारिक पंचांग के रूप में मान्यता प्राप्त है।
कलियुग संवत- इसकी गणना महाभारत काल से की जाती है।
हिन्दू नववर्ष के उत्सव और नाम
भारत के विभिन्न हिस्सों में हिन्दू नववर्ष अलग-अलग नामों से मनाया जाता है—
गुड़ी पड़वा (महाराष्ट्र)
युगादी (आंध्र प्रदेश, कर्नाटक)
चेटी चंड (सिंधी समुदाय)
संवत्सर पाड़वो (गोवा)
थैपुसम (तमिलनाडु)
नवसंवत्सर का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
यह बसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति में नये जीवन के संचार का प्रतीक है।
इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी।
यह समय फसल कटाई और नये कार्यो की शुरूआत के लिये शुभ माना जाता है।
कैसे मनाये हिन्दू नववर्ष या संवसवत्र पर्व
पूजा पाठ, हवन और मंदिरों में विशेश अनुष्ठान किये जाते है।
घरों की सफाई और सजावट की जाती है।
नये वस्त्र धारण किये जाते हैं और परिवार के साथ उत्सव मनाया जाता है।

