एक वर्ष में 22 लाख लीटर पानी वाटर हार्वेस्टिंग से शुद्ध होगा-प्रो. अविनाश तिवारी
ग्वालियर. जीवाजी विश्वविद्यालय के एडमिन बिल्डिंग के नजदीक पर्यारण संरक्षण के क्षेत्र में नये -नये सुधारात्मक एवं रचानात्मक कदम उठा रहा है। इसी के चलते भूजल के गिरते स्तर को सुधारने के उद्देश्य से वर्षा जल का शुद्धिकरण कर उसे जमीन तक पहुंचाने के लिये जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाश तिवारी की पहल पर सदियो पुरानी पद्धति के नवाचार पर आधारित रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया है। पुरातन काल में कोयला, पत्थर जैसे प्राकृतिक पदार्थो का उपयोग कर पानी को शुद्ध किया जाता था। उसी तरह से जीवाजी विश्वविद्यालय के रेन वाटर प्यूरीफिकेशन एंड रीचार्जिग सिस्टम में इन पदार्थो का उपयोग किया गया है, जिससे लगभग ढाई लाख लीटर पानी की बचत होगी जो हर वर्ष बारिश में व्यर्थ बह जाता था। अभी यह सिस्टम जीवाजी विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन के कैम्पस में लगाया है। आगे इसे परीक्षा केन्द्र सेंट्रल लायब्रेरी समेत अन्य भवनों में लगाया जायेगा। इसमें मकान की छत से जमीन तक पानी लाने वाले पाइप के साथ इस सिस्टम को फिट कर दिया जाता है। सिस्टम का निकास द्वारा सीधा नजदीकी बोरिंग से जुड़ा होता है। जिसमें वर्षा का जल शुद्ध होकर भूमिगत जल स्तर को बढ़ाता है।
रखरखाव पर प्रतिवर्ष 200 रूपये खर्च
इस सिस्टम के रखरखाव का खर्चा महज 200 रूपये प्रतिवर्ष है। इसमें वर्ष में एक बार सिर्फ कोयला और चारकोल को बदला जाता है। क्योंकि एक वर्षा के सीजन के बाद कोयला व चारकोल की पानी के शुद्धिकरण की क्षमता समाप्त हो जाती है ऐसे में ढाई-ढाई किलो कोयला व चारकोल खरीदकर चेम्बरों में डाला जाता है। शेष के 2 चेम्बरों में मौजूद संगमरमर के टुकडों और कंकड़ों को हाथ से ही घिसकर साफ कर दिया जाता है।
पद्धति का आधुनिकरण
इसमें वर्षा के पानी को बोरिंग तक पहुंचाने के लियिे पाइपनुमा सिस्टम बनाया है। इसमें 4 चेम्बर हैं। पहले चेम्बर में कोयले की परत बिछाई गयी है। इसमें बरसात का पानी सीधे पहुंचता है। दूसरे चेम्बर की चौडाई अपेक्षाकृत कम है। जिसमें चारकोल की परत से पानी का दूसरी बार शुद्धिकरण किया जाता है। तीसरा चेम्बर और संकरा हो जाता है तथा संगमरमर के टुकड़ों से पानी में मौजूद मोटी गंदगी दूर हो जाती है। चौथा चेम्बर सबसे पहले चेम्बर जितना चौड़ा होता और इसमें कंकड़ की परते होती हैं। चेम्बर की चौड़ाई इस वजह से कम हो जाती है। ताकि बरसात के पानी का दबाव कम होता जाये और पानी का शुद्धिकरण धीरे-धीरे हो सके।
ऐसे होता है जल साफ
वैदिक तकनीक से वाटर हार्वेस्टिंग की सलाह पंकज तिवारी को शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने दी थी। उन्होंने बताया था कि पुराने समय में पत्थर का कोयला, चारकोल, संगमरमर के टुकड़ों और कंकड़ को विछाकर पानी को शुद्ध किया जाता था। एक ही आकार के घड़ों को एक के ऊपर एक रखकर उसमें इन चीजों की परते बिछपाई जाती थी और सबसे ऊपर के घड़े में अशुद्ध पानी रहता था। घड़ों के तल में छेद कर पानी की धार के माध्यम से दूसरे घड़ों तक पहुंचाया जाता था।
परिसर को हराभरा बनाने के लिये
जीवाजी विश्वविद्यालय परिसर को हरा भरा बनाने के लिये अभी प्रशासनिक भवन में यह सिस्टम लगवाया गया है। आगे इसे जेयू परिसर में के अन्य भवनों में भी लगवाया जायेगा। एक वर्ष में 22 लाख लीटर रीचार्ज होगा। वाटर हार्वेस्टिंग को लगाने में लगभग 5 लाख रूपये की लागत आई है। इसमें प्रशासनिक भवन की छत 27,500 वर्ग फीट एरिया का पानी वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से बोरिंग के माध्यम में जमीन में भेजा जायेगा।
विमलेन्द्र राठौर, पीआरओ, जेयू

