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22 सिंधिया समर्थकों का हाल, मंत्री के पीछे पड़े पार्टी के ही नेता, विधायक को पूर्व मंत्री से चुनौती

भोपाल. मार्च 2020, 17 दिन चले पॉलिटिकल ड्रामे के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आ गए। फिर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े, अधिकतर जीते जिनमें से 8 मंत्री भी बने। भाजपा में आए इन्हें तीन साल होने वाले हैं, लेकिन अधिकतर जगह अब भी दिल नहीं मिल सके। कहीं चिट्ठी वॉर तो कहीं खुली बयानबाजी चल रही है। सबसे बड़ी वजह तो यही कि कांग्रेस से भाजपा में आए इन नेताओं के कारण भाजपा के उन नेताओं का राजनीतिक वर्चस्व संकट में पड़ गया, जिनका अपने क्षेत्र में एकतरफा राज था।

गोविंद सिंह राजपूत (सुरखी) : भाजपा के पूर्व नेता ही कर रहे मंत्री से जुड़े खुलासे
गोविंद सिंह राजपूत सागर जिले की सुरखी से विधायक और प्रदेश सरकार में राजस्व एवं परिवहन मंत्री हैं। सिंधिया के करीबी माने जाते हैं। नवंबर 2021 के उपचुनाव के बाद से नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह के रिश्तेदार और बीजेपी किसान मोर्चा के जिलाध्यक्ष रहे राजकुमार सिंह ठाकुर ‘धनौरा’ के साथ उनकी राजनीतिक वर्चस्व की जंग चल रही है। पिछले साल धनौरा को बीजेपी से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद तो धनौरा ने मंत्री राजपूत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। ससुराल से मंत्री को दान में मिली 50 एकड़ जमीन के मामले का खुलासा उन्होंने ही किया। हाल में मंत्री के स्कूल की जमीन का मामला भी उजागर किया। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी लगाई गई है। धनौरा अब गांव-गांव पदयात्रा निकालकर बीजेपी के पुराने कार्यकर्ताओं को जोड़कर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

डॉ. प्रभुराम चौधरी (सांची) : पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शेजवार अब भी असंतुष्ट, पार्टी के दो कार्यालय
डॉ. प्रभुराम चौधरी रायसेन जिले के सांची से विधायक हैं। यहां 1985 से 2018 तक दो डॉक्टरों के बीच मुकाबला होता आया है। डॉ. गौरीशंकर शेजवार बीजेपी से चुनाव लड़ते और उनके सामने कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर डॉ. प्रभुराम चौधरी ताल ठोंकते, लेकिन सिंधिया के साथ बीजेपी में शामिल होने के बाद प्रभुराम के प्रचार के लिए शेजवार को आना पड़ा। एक-दूसरे के धुर विरोधी जब साथ आए, तो प्रभुराम रिकॉर्ड 63,809 वोटों से उपचुनाव जीते। दोनों डॉक्टरों के दल तो मिल गए, लेकिन दिल नहीं मिल पाए। उपचुनाव के बाद पार्टी ने शेजवार को नोटिस थमा दिया। शेजवार भी प्रभुराम पर हमले बोलते रहते हैं। दिसंबर 2022 के आखिरी हफ्ते में डॉ. गौरीशंकर शेजवार ने एक कार्यक्रम में कहा कि ‘घोड़ा भी मरेगा और राजा भी मरेगा’। इस बयान को विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। वर्तमान में नई और पुरानी भाजपा कार्यकर्ताओं में मनमुटाव है। यहां डॉ. प्रभुराम चौधरी ने सागर रोड पर श्रीराम परिसर नाम से कार्यालय बना रखा है। दूसरा है जिला भाजपा कार्यालय बस स्टैंड के पास स्थित है। श्रीराम परिसर में कोई कार्यक्रम होता है, तो वहां पुराने भाजपाई नहीं जाते। असल में उनका मानना होता है कि श्रीराम परिसर सिर्फ सिंधिया समर्थक भाजपाइयों के लिए है।

तुलसीराम सिलावट (सांवेर): यहां अच्छा तालमेल, राजनीतिक विरोधी एक जाजम पर
प्रदेश सरकार में जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट का राजनीतिक गढ़ शुरुआत से ही सांवेर रहा है। कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद सिलावट के कद व सम्मान में अंतर नहीं आया। इंदौर में 2 नंबर विधानसभा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय व रमेश मेंदोला के क्षेत्र में भी सिंधिया का ऐतिहासिक स्वागत हुआ था। असर 2020 के उप चुनाव में देखा गया। सिलावट यहां से चुनाव लड़े, तो रमेश मेंदोला रणनीतिकार थे। नतीजा, सिलावट 54 हजार वोटों से जीते। इसके पहले सिलावट जब कांग्रेस में थे, तो विजयवर्गीय व मेंदाला से उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे ही रहे हैं। जहां तक सत्ता व संगठन का सवाल है, भाजपा में आने के बाद दोनों में पार्टी नेताओं से अच्छे ताल्लुकात रहे।

रघुराज कंसाना (मुरैना) : उपचुनाव में हारे तो भितरघात के आरोप लगाए, कार्यकर्ताओं में लड़ाई
चंबल की मुरैना विधानसभा में कांग्रेस को 25 साल बाद जीत मिली। साल 2018 में रघुराज कंसाना कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। सिंधिया के साथ बीजेपी में शामिल होने के बाद रघुराज भाजपा के टिकट पर उपचुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस के राकेश मावई से हार गए। रघुराज ने बीजेपी नेताओं पर भितरघात के आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था- मेरे लिए भाजपा कार्यकर्ताओं ने जी-तोड़ मेहनत की है लेकिन सेकंड लाइन के भाजपा नेताओं ने उपचुनाव में मेरा खुलकर विरोध किया है। मैंने 15 से 20 भाजपा नेताओं की सूची बनाकर प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा को सौंपी है। इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए रघुराज फिर से दावेदारी कर रहे हैं, लेकिन पार्टी के अंदर उनका विरोध हो रहा है। बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह भी मुरैना से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। पिछले साल मई महीने में मुरैना में बीजेपी कार्यकर्ताओं और सिंधिया समर्थकों के बीच विवाद सामने आया था। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मुरैना दौरे पर थे। इस दौरान भाजपा जिलाध्यक्ष योगेश पाल गुप्ता और सिंधिया समर्थक हरिओम शर्मा के बीच विवाद हो गया। दोनों के बीच धक्का-मुक्की तक हुई थी।

ऐदल सिंह कंसाना (सुमावली) : राजनीतिक स्टाइल पसंद नहीं
मुरैना जिले की सुमावली विधानसभा सीट से 1993 में बसपा से पहली बार विधायक बने। अब तक 4 बार विधानसभा सदस्य रह चुके हैं। साल 2008 और 2018 के चुनाव में वे कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मार्च 2020 में बीजेपी जॉइन कर ली। मंत्री बने। उपचुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस के अजब सिंह कुशवाह ने 10,947 वोटों से हरा दिया। कंसाना की राजनीति की अपनी स्टाइल को भाजपा के वरिष्ठ नेता स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। बीजेपी में आने के बाद ऐदल सिंह के परिवार पर पुलिस और प्रशासन पर प्रेशर बनाने के आरोप लगते रहे हैं। सुमावली थाना प्रभारी मनोज यादव ने वीडियो जारी कर फर्जी रेप केस में फंसाने की धमकी देने के आरोप लगाए थे। ऐदल सिंह कंसाना के बेटे बंकू कंसाना पर राजस्थान पुलिस के जवानों का अपहरण का केस भी दर्ज हो चुका है।

कमलेश जाटव (अंबाह) : भाजपा के पूर्व विधायक बंशीलाल से मिल रही चुनौती
मुरैना जिले की अंबाह से विधायक कमलेश जाटव मूलत: भाजपाई हैं। सिंधिया की वजह से कांग्रेस में शामिल हुए थे। सिंधिया भाजपा में आए तो वे भी लौट आए। कमलेश 2008 में बीजेपी के टिकट पर विधायक बने थे। 2013 में बसपा प्रत्याशी सत्यप्रकाश सखवार से हार गए थे। इसके बाद कमलेश जाटव ने कांग्रेस जॉइन कर 2018 में चुनाव लड़े। उपचुनाव में कमलेश जाटव ने कांग्रेस प्रत्याशी सत्यप्रकाश सखवार को 13,892 वोटों से हरा दिया। अब भाजपा के पूर्व विधायक बंशीलाल बीजेपी से टिकट की जुगत में हैं। मुरैना नगर निगम चुनाव में बीजेपी की हार के बाद कमलेश जाटव ने कलेक्टर-एसपी को हार के लिए जिम्मेदार ठहराया। कमलेश ने अफसरों को कांग्रेसी मानसिकता का बताया। मई 2021 में कमलेश जाटव का वीडियो सामने आया। वीडियो में एसडीओपी पर रेत माफिया से पैसे लेकर अवैध परिवहन के आरोप लगा रहे थे।

गिर्राज दंडोतिया (दिमनी) : तोमर समर्थकों से नहीं बैठ रही पटरी
पिछले 45 साल में दिमनी विधानसभा में दो बार ही कांग्रेस जीत दर्ज कर पाई है। 2008 तक यह विधानसभा अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित थी। परिसीमन के बाद अनारक्षित हुई, तो नरेंद्र सिंह तोमर के करीबी शिवमंगल सिंह तोमर विधायक बने। 2013 में बसपा उम्मीदवार बलवीर दंडौतिया जीते। 2018 में फिर उलटफेर हुआ। कांग्रेस उम्मीदवार गिर्राज दंडौतिया 18,477 वोटों से जीते। साल भर बाद वे बीजेपी में शामिल हुए। 2020 के उपचुनाव में गिर्राज कांग्रेस उम्मीदवार रवीद्र सिंह तोमर से हार गए। दिमनी में गिर्राज की पुराने भाजपाइयों से पटरी नहीं बैठ रही। दंडोतिया के सामने शिवमंगल सिंह तोमर टिकट की दावेदारी जता रहे हैं। वहीं, केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे देवेंद्र सिंह तोमर भी तैयारी में जुटे हैं। दिमनी में सिंधिया समर्थक गिर्राज और तोमर समर्थकों के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा।

इमरती देवी (डबरा) : ऐसे बयान और काम जो जिससे नरोत्तम पर अटैक
बीजेपी में शामिल होने के बाद इमरती देवी उपचुनाव में डबरा से हार गईं। हार के बाद उन्होंने कहा था इसलिए हारे क्यों बीच में पार्टी बदल ली। हार के बाद उन्हें लघु उद्योग निगम का अध्यक्ष बनाया है। पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव में इमरती देवी ने डबरा-भितरवार जनपद, डबरा और पिछोर नगर परिषद में समर्थक प्रत्याशी को अध्यक्ष बनवाकर गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के साथ शीतयुद्ध को और हवा दे दी। डबरा में इमरती के सामने 2018 के चुनाव में नरोत्तम के करीबी सुरेश राजे BJP उम्मीदवार थे। इमरती के पार्टी छोड़ते ही सुरेश राजे ने कांग्रेस जॉइन कर ली। नगरीय निकाय चुनाव के दौरान इमरती की सुरेश राजे से बहस भी हुई थी। इसमें इमरती ने कांग्रेस विधायक पर गृहमंत्री के साथ 10 पार्षदों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगाए थे। नरोत्तम के खेमे से राजू खटीक, ड़बरा नगर पालिका की पूर्व अध्यक्ष आरती मौर्य टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। राजू खटीक की पत्नी जिला पंचायत सदस्य हैं। चुनाव हारने के बाद बीजेपी के पुराने कार्यकर्ताओं और इमरती के बीच अक्सर टकराव की स्थिति बन जाती है।

हरदीप सिंह डंग (सुवासरा) : पूर्व विधायक को ही दरकिनार कर दिया
मध्यप्रदेश में तख्तापलट के समय सबसे पहले इस्तीफा देने वालों में मंदसौर के सुवासरा से कांग्रेस विधायक रहे हरदीप सिंह डंग थे। वर्तमान में हरदीप सिंह नवीन एवं नवीनीकरण ऊर्जा मंत्री हैं। कांग्रेस विधायक रहते हुए उन्होंने कई बार कमलनाथ सरकार पर उपेक्षा के आरोप लगाए। डंग समर्थकों की बात ज्यादा मानी जाने से भाजपा के पुराने कार्यकर्ता नाराज हैं। हरदीप सिंह डंग के सामने चुनाव लड़ चुके बीजेपी के पूर्व विधायक राधेश्याम पाटीदार से भी रिश्ते अच्छे नहीं बन पाए हैं। कई बार सरकार और दूसरे आयोजनों में आमंत्रण पत्र से राधेश्याम पाटीदार का नाम तक हटा दिया। उन्हें मंच पर जगह भी नहीं दी गई। आयोजनों से दरकिनार किया जाने लगा। इस वजह से दोनों के समर्थकों में गुस्सा है।

बृजेंद्र सिंह यादव (मुंगावली) : जिन्हें हराया वे अब कैसे साथ आएं
अशोकनगर जिले के मुंगावली से विधायक और प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री बृजेंद्र सिंह के साथ उनके पुराने समर्थक ही दिखते हैं, जबकि मूल भाजपा कार्यकर्ता अलग राह पर हैं। मुंगावली में 5 साल में दो बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। पहले स्वर्गीय देशराज सिंह की पत्नी बाईसाहब यादव बीजेपी के टिकट पर बृजेंद्र सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ीं, वह हार गई थीं। दूसरे चुनाव में बृजेंद्र सिंह ने भाजपा के केपी यादव को हराया। उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर लड़े और जीते। अब दोनों भाजपा में हैं, लेकिन आज तक एक नहीं हो पाए हैं। ।

जजपाल सिंह जज्जी (अशोकनगर): भाजपा के हारे कोरी ही जज्जी के खिलाफ कोर्ट में
अशोकनगर जिला मुख्यालय पर भाजपा में स्पष्ट रूप से दो गुट सक्रिय हैं। एक खेमा सिंधिया समर्थक, जबकि दूसरा मूल भाजपा का। अब तक जो भाजपा के जिला अध्यक्ष बने हैं, वे सभी एक ग्रुप में हैं, जबकि जज्जी का अलग ही गुट है। 2018 में जज्जी ने भाजपा के लड्डूराम कोरी को हराया था। जज्जी भले ही भाजपा में आ गए लेकिर कोरी अपने हार के गम को नहीं भूला पाए हैं। उन्होंने जज्जी के जाति प्रमाण पत्र को निरस्त कराने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिससे जज्जी पर संकट खड़ा हो गया था। मंदिर से लेकर हर जगह जज्जी के लिए मन्नत मांगने के लिए सिंधिया समर्थक ही खड़े दिखाई दिए। हर कार्यक्रम में वे भाजपा की तुलना में सिंधिया की तारीफ ज्यादा करते हैं। कांग्रेसी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए कार्यकर्ता अलग ही छवि बनाने के लिए काम करते हैं, जबकि मूल भाजपा कार्यकर्ता अलग दिखाई देते हैं।

सुरेश धाकड़ (पोहरी) : सिंधिया, शिवराज अलावा किसी से मतलब नहीं
शिवपुरी के पोहरी से विधायक सुरेश धाकड़ पीडब्ल्यूडी राज्यमंत्री हैं। वे आज भी भाजपा के सांचे में नहीं ढल पाए हैं। अक्सर बड़े मंचों पर पहुंचते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी सिर्फ नाम मात्र की रहती है। जिला कार्यालय पर भी कई लोग मंत्री से दूर ही रहते हैं। हाल में मंत्री ने क्रिकेट का बड़ा टूर्नामेंट करवाया था। इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महा आर्यमन को बुलाया था। कार्यक्रम में नगर को बैनर पोस्टरों से पाट दिया गया, लेकिन इनसे भाजपा का निशान तक गायब था। कुछ ही जगह सिर्फ शिवराज सिंह चौहान को ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ जगह दी गई थी। सभी बैनरों में ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके बेटे महा आर्यमन सिंधिया के साथ-साथ उनकी दादी राजमाता सिंधिया को जगह दी गई थी।

जसवंत जाटव (करेरा) : हार के बाद भाजपाइयों से बनाई दूरी
शिवपुरी से करैरा के जसवंत जाटव चुनाव हार गए। उन्हें राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम का अध्यक्ष बना दिया गया। करैरा विधानसभा से चुनाव लड़ने के लिए पहले से ही लंबी कतार थी। जसवंत कांग्रेस को छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। उपचुनाव में उन्हें वोटरों ने उन्हें नकार दिया। इस विधानसभा से कांग्रेस के प्रत्याशी प्रागीलाल जाटव ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद मूल भाजपा कार्यकर्ताओं से उनकी दूरी बढ़ गई। फिलहाल, जसवंत जाटव क्षेत्र में अपने लोगों की मदद से राजनीतिक पकड़ दोबारा मजबूत करने में लगे हैं।

रणवीर जाटव (गोहद): बीजेपी के राष्ट्रीय नेता से टिकट का मुकाबला
भिंड जिले की गोहद विधानसभा में बीजेपी के दो मुख्य दावेदार हैं। इनमें एक पूर्व मंत्री व वर्तमान में बीजेपी एससी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालसिंह आर्य हैं। दूसरे- सिंधिया समर्थक व मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम अध्यक्ष रणवीर जाटव हैं। दोनों ही नेताओं में लंबे समय से राजनीतिक तलवारें खिंची हुई हैं। विधानसभा स्तर में मंडल के पदाधिकारियों में ज्यादातर समर्थक पूर्व मंत्री लाल सिंह आर्य के हैं। यही कारण है कि जिला स्तर के पार्टी कार्यक्रमों को छोड़ दिया जाए, तो स्थानीय स्तर के पार्टी की बैठकों में रणवीर जाटव की उपस्थिति नहीं के बराबर रहती है।

ओपीएस भदौरिया (मेहगांव) : कांग्रेस से आए कार्यकर्ताओं की भीड़ ही ज्यादा
भिंड की मेहगांव विधानसभा क्षेत्र में भी खींचतान है। मेहगांव से बीजेपी से चुनावी रण में उतरने के प्रबल दावेदार चौधरी मुकेश सिंह, राकेश शुक्ला और केपीएस भदौरिया हैं। स्थानीय स्तर पर ओपीएस भदौरिया के साथ कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल होने वाले समर्थक उनके साथ ज्यादा नजर आते हैं। हालांकि स्थानीय जिला स्तरीय कार्यक्रम में रणवीर जाटव की अपेक्षा ओपीएस की उपस्थिति ज्यादा रहती है। बावजूद बीजेपी के पुराने कार्यकर्ता व नेताओं के बीच गहरी पैठ बनाने में मंत्री भदौरिया कमजोर दिख रहे हैं। मेहगांव से बीजेपी के विधायक रहे चौधरी मुकेश सिंह चतुर्वेदी इसी क्षेत्र से टिकट के लिए लॉबिंग कर रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व मंत्री चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी के छोटे भाई मुकेश चौधरी बीजेपी में प्रदेश उपाध्यक्ष और सागर संभाग के प्रभारी हैं।

मुन्नालाल गोयल (ग्वालियर पूर्व) : संगठन की बजाय सिंधिया ही सबकुछ
ग्वालियर पूर्व के विधायक मुन्नालाल गोयल को उपचुनाव हारने के बाद बीज विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया था। वे भाजपा संगठन की बैठक में कम ही नजर आते हैं, लेकिन सिंधिया के आगमन के समय ही ज्यादा दिखते हैं। ज्यादातर सिंधिया समर्थक गुट के साथ ही दिखते हैं। बड़े मौकों पर ही भाजपा सगंठन व पदाधिकारियों के बीच नजर आते हैं।। साल 2018 में मुन्नालाल गोयल ने कांग्रेस में रहते हुए बीजेपी के सतीश सिकरवार को हराया था। मुन्नालाल कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गए। उपचुनाव लड़ा तो सतीश सिकरवार ने भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया। चुनाव में मुन्नालाल गोयल को हराया। अब दोनों में बातचीत एक-दूसरे पर व्यंग्य करते हुए होती है। हाल में मुन्ना ने सत्ता में होने के बाद भी सतीश व उनकी पत्नी महापौर शोभा सिकरवार के खिलाफ धरना प्रदर्शन का ऐलान किया था। मूल भाजपाई व पदाधिकारियों का भी उनके प्रति खास रुख नहीं है। हालांकि, अभी तक ऐसा बयान सामने नहीं आया है।

मनोज चौधरी (हाटपिपलिया) : पूर्व मंत्री जोशी ने खोल रखा है मोर्चा
हाटपिपलिया से पूर्व विधायक रहे दीपक जोशी और मनोज चौधरी के बीच उपचुनाव के समय से ही दूरियां हैं। हाल में हाटपिपलिया विधानसभा क्षेत्र में लैंड पुलिंग योजना के तहत किसानों की जमीन लेने की बात सरकार द्वारा कही गई थी। इसके चलते किसानों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए ट्रैक्टर रैली निकाली थी। योजना में 32 गांवों को शामिल किया गया है। इनमें अधिकांश गांव हाटपिपलिया क्षेत्र के हैं। इस योजना के बाद से ही मनोज चौधरी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। किसानों का कहना है कि योजना को अगर क्षेत्र में लागू किया जाएगा, तो सरकार को परिणाम भुगतना पड़ेंगे। किसानों ने योजना को लेकर आगामी दिनों में आंदोलन की चेतावनी दी है। किसान विधायक से नाराज हैं। बीजेपी के पूर्व सीएम कैलाश जोशी के बेटे दीपक जोशी भी इसी सीट से विधायक और मंत्री रहे हैं।

महेंद्र सिंह सिसोदिया (बमोरी) : आसपास सिंधिया समर्थक ही दिखते हैं
गुना जिले की बमोरी विधानसभा से विधायक और पंचायत मंत्री हैं। फिलहाल स्थानीय नेताओं से महेंद्र सिंह सिसोदिया का सामंजस्य ठीक है। वह संगठन की बैठकों में भी जा रहे हैं। संगठन के निर्णयों में भी उनकी भूमिका सकारात्मक ही रही है लेकिन पुराने भाजपा नेता और कार्यकर्ता उन्हें स्वीकार नहीं कर पाए हैं। उसके आस-पास ज्यादातर सिंधिया समर्थक और उनके पुराने साथी ही रहते हैं। उनके इलाके में निर्माण कार्य अधिकतर उनके पुराने साथियों को ही मिले हैं।

बिसाहू लाल सिंह (अनूपपुर) : पूर्व विधायक रामलाल विरोध कर चुक हैं
अनूपपुर में भाजपा दो गुटों में बंटी है। भाजपा के पूर्व विधायक रामलाल और प्रदेश सरकार में खाद्य मंत्री बिसाहूलाल। हर मंच पर दोनों के बीच टकराव दिखता है। बिसाहूलाल सिंह के किसी भी कार्यक्रम में रामलाल के पोस्टर- बैनर से गायब ही रहते हैं। जब बिसाहूलाल सिंह ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी, तो उनके पहले कार्यक्रम में रामलाल का नाम पोस्टर व बैनर से गायब था। पूर्व विधायक रामलाल भी अपने ही सरकार के खिलाफ कई बार मोर्चा खोल चुके हैं। ओवरब्रिज निर्माण ना होने के कारण वे सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठे थे। वहीं, बिसाहूलाल सिंह के भाजपा में आने के बाद पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी है।

राजवर्धन सिंह दत्तीगांव (बदनावर) : जिलाध्यक्ष से तालमेल ठीक नहीं
बदनावर से विधायक और प्रदेश सरकार में उद्योग मंत्री हैं। इस चुनाव में कांग्रेस छोड़कर कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा में आए थे। यहां दत्तीगांव का भाजपा संगठन के नेताओं से तालमेल तो है, लेकिन खबर है कि जिलाध्यक्ष राजीव यादव से पटरी नहीं बैठ रही। गत जिला पंचायत के अध्यक्ष चुनाव में मंत्री अपने समर्थक को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाना चाहते थे, किंतु यादव ने सहमति नहीं जताई। ऐसे में दोनों के बीच मनमुटाव हो गया। हालांकि दोनों ने एक-दूसरे खिलाफ सार्वजनिक तौर पर बयान नहीं दिया।

प्रद्युम्न सिंह तोमर (ग्वालियर) : चुनौती जयभान सिंह से
ग्वालियर से विधायक, प्रदेश सरकार में ऊर्जा मंत्री। भाजपा संगठन, जिलाध्यक्ष व पदाधिकारियों से ठीक तालमेल है। संगठन की बैठकों में नजर आते हैं। जिलाध्यक्ष व अन्य पदाधिकारियों से मिलते हैं। बैठकों में मुख्य रूप से डेस्क पर रहते हैं, लेकिन उनके आसपास मूल भाजपाई की अपेक्षा उनके व सिंधिया समर्थक भाजपाई ही नजर आते हैं।
साल 2018 में कांग्रेस में रहते हुए तोमर ने भाजपा के जयभान सिंह को हराया था। अब दोनों एक ही दल में हैं, लेकिन कभी बातचीत करते नजर नहीं आते। हालांकि किसी नेता के खिलाफ अभी तक बयान सामने नहीं आया है। मूल व पुराने भाजपाइयों ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।

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