मकर संक्राति का महत्व- सूर्य देव के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश का दिन है- डॉ राजकुमार तिवारी

ग्वालियर. मकर संक्रांति का यह पावन पर्व सूर्य देव के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश का दिन है । मकर राशि के स्वामी शनि हैं, जो सूर्य देव के पुत्र हैं । मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र के घर में एक माह के लिए निवास करते हैं । यह पर्व पिता-पुत्र के संबंधों में प्रगाढता का प्रतीक है । हिंदुओं के लिए साल का पहला पर्व मकर संक्रान्ति होता है ।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, कर्क से लेकर धनु राशि तक सूर्य दक्षिणायन रहते हैं तथा मकर से मिथुन राशि तक सूर्य उत्तरायण में भ्रमण करते हैं। दक्षिणायन की अवधि में दिन छोटे होने लगते हैं जबकि उत्तरायण की अवधि में दिन बडे होने लगते हैं। मकर संक्रांति की अवधि के दौरान दिन और रात एकदम बराबर रहते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन में 6 मास देवताओं की रात्रि हो ती है और उत्तरायण में 6 मास देवताओं के दिन माने गये हैं अर्थात मकर संक्रांति के समय से देवताओं का प्रभात काल प्रारंभ हो जाता है। इस शुभ अवधि में स्त्रान, दान, जप, तर्पण आदि किये गये कार्यो का विशेष महत्व होता है ।
पंचांग के अनुसार
त्योहार एक रूप अनेक: इस त्यौहार को अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है । मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल के रूप में तो आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व केरला में यह पर्व केवल संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। हर साल संक्रांति अपने भक्तों के लिए कुछ ना कुछ लेकर आती है । हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व १३ जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन अँधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है ।
इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है । इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँ आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। बहुएँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं । नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है । इसके साथ पारम्परिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनन्द भी उठाया जाता है ।
मकर संक्रान्ति का ऐतिहासिक महत्व: ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का ही चयन किया था। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं ।

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