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पांच गांव की दस्तान-लगता है पानी भरते-भरते ही मर जायेंगे, बारिश के दिनों नाले-गड्ढे का पानी पीते हैं

महिलाएं 4 किलोमीटर पैदल चलकर जंगल के कुएं से पानी लाती हैं।

मुरैना. 25 सालों इस गांव में ब्याह कर आयी थी ।तब से जिन्दगी का सबसे बड़ा काम पानी भरना ही रह गया है। ऐसा लगता है कि अब पानी भरते-भरते ही मर जायेंगे। बरसात में कीचड़ का पानी पीते हैं। फिर पूरा गांव बीमार हो जाता हैं यह कहते हुए राजकुमारी आदिवासी महिलों की आंखों में आंसू आ गये। कहती हैं- एक बाल्टी पानी पानी के लिये प्रतिदिन 4 किमी चलकर तपती धूप और सिर पर पानी का बोझ- अब यही हमारी जिन्दगी बन चुकी है। मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के रामपुर इलाके में बसे 5 आदिवासी गांव-बन्हेरी (बरखेड़ा), सिंगारदेह, सिंगारदेह खालसा, भवरेछा और जरेगना मंें पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता का हाल जाना।
बहेरी गांव-45 डिग्री की भीषण गर्मी में महिलाएं बच्चे ढो रहे पानी
45 डिग्री की भीषण गर्मी में यहां की महिलाएं और बच्चे रोजाना 4 किलोमीटर पैदल चलकर सिर्फ पीने का पानी जुटा रहे हैं। सबसे दर्दनाक तस्वीर बरखेड़ा ग्राम पंचायत के बहेरी गांव की है, जहां करीब 200 आदिवासी परिवार रहते हैं। दोपहर 2 बजे 45 डिग्री तापमान में गांव पहुंची तो महिलाएं और बच्चे सिर पर पानी ढोते नजर आए। छोटे-छोटे बच्चे भी अपने हिस्से का पानी लेकर लौट रहे थे।
“जिंदगी बीत गई… लेकिन प्यास नहीं बुझी”
बुजुर्ग दक्खो बाई आदिवासी की आंखों में उम्र की थकान से ज्यादा वर्षों की प्यास दिखाई देती है। वह कहती हैं कि जब इस गांव में दुल्हन बनकर आई थी, तब भी पानी की समस्या थी। आज बाल सफेद हो गए। पति इस दुनिया से चले गए, लेकिन गांव की प्यास आज भी वैसी ही है। मैंने पूरी जिंदगी सिर पर घड़े उठाकर श्योपुर जिले के कुएं से पानी ढोते हुए गुजार दी। तपती दोपहरी में कई किलोमीटर पैदल चलना मजबूरी बन चुका है। गर्मियों में किसी तरह कुएं का पानी मिल जाता है, लेकिन बरसात आते ही हालात और भयावह हो जाते हैं। गांव वाले नालों और गड्ढों में जमा कीचड़ वाला पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं। गंदा पानी पीने से हर साल गांव में बीमारियां फैलती हैं। मजबूरी ऐसी है कि प्यास बुझाने के लिए वही पानी पीना पड़ता है।

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