बिना सीमांकन खदानों का कब्जा देने पर हाईकोर्ट ने लगाई फटकार, बिलौआ खनन में 22 नये पक्षकारों को नोटिस
ग्वालियर. बिलौआ इलाके में अवैध खनन मामले में हाईकोर्ट की युगल पीठ ने सुनवाई के दौरान मायनिंग विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने कहा है कि बिना सीमांकन (डीमार्केशन) के खदानों का कब्जा सोंप दिया गया। जिसमें अब ऑफिसर स्वयं यह बताने की स्थिति में नहीं है किस लीजधारक की खदान कहां से शुरू होती और कहा खत्म।
सुनवाई के बीच हाईकोर्ट ने र्मसर्स गुरू ग्रेनाइट/मिरेन्द्र सिंह की लीज नवीनीकरण फाइल को नमूने के रूप में देखा। रिकॉर्ड से सामने आया है कि 2004 में बिना सीमांकन के ही खदान का कब्जा दे दिया गया था। राजस्व रिकॉर्ड में भी जमीन का स्पष्ट बंटवारा नहीं था। हाईकोर्ट नेमाना कि इसी लापरवाही का लाभ उठाकर वर्षो तक मनमाने तरीके में खनन किया गया। सुनवाई के दौरान एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया। हाईकोर्ट ने जब डबरा एसडीओ की सहायता के लिये मायनिंग ऑफिसर घनश्याम यादव को बुलाया तो वह हाईकोर्ट में मौजूद एक निजी व्यक्ति से परमिशन लेने लगे। पूछने पर उस व्यक्ति ने स्वयं को एक खदान संचालक पर कर्मचारी बताया। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी सरकार ऑफिसर का निजी व्यक्ति से अनुमति लेना बेहद गंभीर मामला है। राज्य सरकार को इस पर विचार करना चाहिये।
अवैध खनन का मामला लंबित, फिर भी लीज कर दी रिन्यू
सुनवाई में यह भी सामने आया कि मिरेन्द्र सिंह के खिलाफ अवैध खनन का मामला कलेक्टर कोर्ट में लंबित था। इसके बावजूद वर्ष 2022 में खनिज विभाग ने उन्हें ‘नो ड्यूज’ प्रमाण पत्र जारी कर दिया। इसके बाद 2023 से 2033 तक उनकी खदान की लीज भी नवीनीकृत कर दी गई। हाईकोर्ट ने इस पर सवाल उठाया कि जब मामला लंबित था तो लीज का नवीनीकरण कैसे किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि अवैध खनिज से भरे वाहन ई-चेकपोस्ट से बचने के लिए बिलौआ थाना क्षेत्र के पास स्थित टोल प्लाजा वाले रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। इस पर हाईकोर्ट ने पिछले एक महीने के टोल प्लाजा के CCTV फुटेज जब्त कर कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए हैं। राज्य सरकार ने फुटेज उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है।अब इस मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च 2026 को होगी। तब तक हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश प्रभावी रहेगा और खनिज विभाग की कार्रवाई पर अदालत की नजर बनी रहेगी।

