अनाधिकृत अनुपस्थिति पर सीधे नौकरी नहीं छींन सकते -हाईकोर्ट
ग्वालियर. एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने कर्मचारी सेवा नियमों का लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल अनाधिकृत अनुपस्थित के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से हटाना या अनविार्य सेवानिवृत्त करना उचित नहीं है। विभागीय जांच में यह स्पष्ट होना चाहिये कर्मचारी जानबूझ कर ड्यूटी से दूर रहा है या इसके बिना इतनी कठोर सजा नहीं दी जा सकती है।
न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की एकलपीठ ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी करन खरे की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश निरस्त कर दिया गया है। लश्कर निवासी करन खरे 1998 से बैंक में कार्यरत है। बैंक ने उन पर 586 दिन बिना अनुमति अनुपस्थित रहने का आरोप लगाते हुए 24 जुलाई 2024 को अनिवार्य सेवा निवृत्ति की कार्यवाही की थी। विभागीय अपील और पुनरीक्षण याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
बीमारी के दस्तावेज दिए, फिर भी नहीं माना बैंक
याचिका में करन खरे ने कहा कि वर्ष 2019 में उन्होंने तत्कालीन बैंक प्रबंधक के खिलाफ जातिगत प्रताड़ना की शिकायत की थी। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। उन्होंने यह भी बताया कि अनुपस्थिति के दौरान वह गंभीर रूप से बीमार थे और इलाज से जुड़े मेडिकल दस्तावेज बैंक को दिए थे। इसके बावजूद बिना किसी चिकित्सकीय जांच के बैंक ने उन्हें संदिग्ध मान लिया।
कर्मचारी की ओर से यह भी कहा गया कि वर्ष 2019 से 2021 के बीच की जिस अवधि को आधार बनाकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई, उसके एक हिस्से के लिए पहले ही विभागीय जांच के बाद लघु दंड दिया जा चुका था। ऐसे में उसी अवधि के आधार पर दोबारा कठोर कार्रवाई करना उचित नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई में निष्पक्ष प्रक्रिया, पर्याप्त कारण और नियमों का पालन जरूरी है। केवल आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी के भविष्य पर कठोर फैसला नहीं लिया जा सकता।

