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कौन हैं नरोत्तम मिश्रा, समुद्र की लहरें पीछे जाती देख, तो किनारे पर घर मत बना लेना, मैं लौटकर आऊंगा, जिसके टिकट कटने से दतिया में मचा हंगामा

Narottam Mishra
नई दिल्ली. ‘‘समुद्र की लहरें पीछे जाती दिखाई दे ंतो किनारे पर घर मत बना लेना….मैं लौटकर आऊंगा’’ 2023 के विधानसभा चुना में हार के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा का यह शायराना बयान केवल हार स्वीकार करने का संदेश नहीं था। बल्कि राजनीतिक वापिसी का ऐलान भी माना गया था। लेकिन करीब डेढ वर्ष साल बाद दतिया विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा फैसला लिया जिसने मध्यप्रदेश की राजनीति में नई चचा्र छेड़ दी। डॉ. नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक प्रभाव केवल दतिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्वालियर-चंबल अंचलकी राजनीति में भी उनकी मजबूत पहचान रही है। उनका पैतृक निवास डबरा में वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद डबरा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित हो गयी। जिसके बाद उन्होंने दतिया का अपनी नयी राजनीतक कर्मभूमि बनाया।

Narottam Mishra
बीजेपी के टिकट पर उन्होंने 2008, 2013 और 2018 में लगातार जीत दर्ज की। शिवराज सिंह चौहान सरकार में वह गृहमंत्री समेत कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालते रहे। उन्हें लम्बे समय तक एमपी भाजपा का प्रमुख ब्राह्मण चेहरा और शिवराज सरकार का सबसे प्रभावशाली मंत्री माना गया। वर्ष 2023 का विधानसभा चुनाव नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन दौर साबित हुआ। तत्कालीन गृहमंत्री रहते हुए उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार राजेन्द्र भारती के हाथों हार का सामना करना पड़ा। बाद में राजेन्द्र भारती की विधानसभा सदस्यता समाप्त होने से दतिया सीट खाली हुई और उपचुनाव की स्थिति बनी। दतिया लम्बे समय तक नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक गढ़ रही है। 2008 के बाद उन्होंने लगातार यहां जीत दर्ज की और इस सीट को बीजेपी के मजबूत गढ़ों में शामिल किया गया। यहीं से उन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाया गया। राज्य सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में जगह बनाई। 15 अप्रैल 1960 को ग्वालियर में जन्मे डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने एमए पीएचडी की पढ़ाई जीवाजी विश्वविद्यालय से की ।छात्र जीवन में ही वह राजनीति से जुड़ गये। वर्ष 1977-78 में वह जीवाजी विश्वविद्यालय छात्रसंघ के सचिव बने। इसके बाद उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से रहा।

Narottam Mishra
वह भाजयुवा मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी से लेकर बीजेपी प्रदेश कार्यकारिणी तक विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते हुए लगातार आगे बढ़ते गये। 1990 में पहली बार विधायक बने और विधानसभा में सचेतक की भूमिका भी निभाई। इसके बाद 1998, 2003, 2008,2013 और 2018 में लगातार विधानसभा पहुंचे। 1 जून 2005 को बाबूलाल गौर मंत्रिमंडल में उन्हें पहली बार राज्यमंत्री बनाया गया। कमलनाथ सरकार के पतन और चर्चित ‘ऑपरेशन लोट्स’ में भी डॉ. नरोत्तम मिश्रा की भूमिका को बीजेपी के अन्दर बेहद अहम माना जाता है।

Narottam Mishra संगठन और सत्ता के बीच बेहतर समन्वय, रणीनतिक क्षमता और आक्रामक राजनैतिक शैली ने उन्हें लम्बे समय तक बीजेपी के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल रखा। ग्वालियर-चंबल इलाके भाजपा की राजनीति का अहम केन्द्र माना जाता है। इसी इलाके से केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेन्द्रसिंह तोमर और डॉ. नरोत्तम मिश्रा जैसे बड़े नेता उभर कर सामने आये।

नरोत्तम मिश्रालम्बे समय तक यह तिकड़ी क्षेत्र में बीजेपी की राजनीतिक ताकत का प्रमुख आधार रहीं। सूत्रों के अनुसार दिल्ली स्तर पर कराये सर्वे में डॉ. नरोत्तम मिश्रा की स्थिति मजबूत नहीं पायी गयी। जो इस बार उनके टिकट कटने का आधार बनी। केन्द्रीय नेतृत्व ने लोकप्रियता के साथ-साथ स्थानीय संगठन और भविष्य की राजनीतिक स्वीकार्यता का आकलन करने के बाद ही आशुतोष तिवारी के नाम पर मुहर लगाई।

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