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सरकारी फाइल गायब, जानबूझ कर हटाई गयी, ग्वालियर कलेक्टर अपने कर्तव्य में विफल, प्रमुख सचिव को दिये जांच के आदेश-हाईकोर्ट

ग्वालियर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच की एकल पीठ ने कलेक्ट्रेट सरकारी जमीन की फाइल गायब होने के प्रकरण में कलेक्टर कार्यालय की कामकाज पर सवाल खड़े किये हैं। हाईकोर्ट ने कहा है कि मामले की सही जांच नहीं हुई है। जिम्मेदारी तय करने में लापरवाही बरती गयी है।
हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि या तो सरकारी अधिवक्ता कार्यालय की तरफ से लापरवाही हुई है या फिर कलेक्टर कार्यालय में किसी ने जानबूझ कर फाइलें हटाई है। इसके बावजूद, असली वजह तलाशने के बजाये जिम्मेदारी इधर-उधर डाली गयी है। हाईकोर्ट ने कलेक्टर को अपने कर्तव्य पालन में विफल बताया है और कहा कि अब पूरे प्रकरण की जांच प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग द्वारा कराये जाने की आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने जांच के लिये 2 माह का समय दिया है।
पूरे कलेक्ट्रेट कार्यालय उपलब्ध नहीं है फाइल हाईकोर्ट में सुनवाई के बीच सामने आया है वर्ष 2000 से जुड़े एक सिविल सेकेंड अपील से संबंधित पूरी फाइल ग्वालियर के कलेक्टर कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। केवल आउटवर्ड रजिस्टर में एक एंट्री मिली है जिसमें भी यह संकेत मिलता है तत्कालीन एसडीओ ने अपील दायर करने की अनुमति के लिये मांगी थी। हालांकि, अनुमति दी गयी या नहीं, इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया है कि अपील 2 दिसंबर 2006 को दायर की गयी थी। इसमें तत्कालीन एसडीओ बीबीएस तोमर ने स्वयं को ओआईसी बताते हुए वकालतनामा पर हस्ताक्षर किये थे। जबकि उनके ओआईसी नियुक्त होने का कोई आदेश उपलब्ध नहीं है। कलेक्टर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में भी कई खामियां सामने आयी है। जिन अधिकारियों पर जिम्मेदारी डाली गयी। उनके बारे में यह तक रिकॉर्ड नहीं था कि उन्हें मामले की जानकारी थी या उन्हें ओआईसी नियुक्त किया गया था। हाईकोर्ट ने इसे सतही जांच बताते हुए नाराजगी व्यक्त की है।
ऐसे समझें मामला
कोटा लश्कर में मंदिर की 5.19 बीघा जमीन मौजूद थी। इस जमीन पर योगेश शर्मा अन्य ने दावा किया।
19 अप्रैल 2000 को योगेश शर्मा के पक्ष में फैसला हो गया। आदेश के खिलाफ शासन ने अपील दायर की। जिसे अक्टूबर 2003 में खारिज कर दिया।
2006 में आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। जो 19 फरवरी 2009 को खारिज हुई।
अपील को फिर से सुनवाई में लाने के लिए शासन ने आवेदन लगाया।
3327 दिन देर से शासन ने आवेदन लगाया। इस पूरे मामले में कौन जिम्मेदार हैं।
इन सवालों के अब जवाब देने होंंगे
क्या द्वितीय अपील दायर करने के लिए राज्य सरकार से कोई अनुमति ली गई थी या नहीं?
क्या राज्य या कलेक्टर द्वारा कभी ओआईसी की नियुक्ति का कोई आदेश जारी किया था?
जब ग्वालियर कलेक्टर को अपीलकर्ता के रूप में दर्शाया था तो तत्कालीन कलेक्टर ने उस मामले पर नजर क्यों नहीं रखी?
यदि अपील अनुमति के साथ दायर की गई थी, तो ओआईसी की नियुक्ति के आदेश क्यों जारी नहीं किए गए, और यदि जारी किए गए थे, तो उन्हें फाइल से किसने हटाया?
कलेक्टर ने गायब फाइल, नियुक्ति आदेश या राज्य की अनुमति के संबंध में जांच क्यों नहीं की?

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