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10 साल से अटकी पदोन्नति का होगा हिसाब, साल में दो बार प्रमोशन की तैयारी

भोपाल-राज्य सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों को साल में दो बार विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) के माध्यम से प्रमोशन देने की तैयारी में है। प्रदेश के सभी 54 विभागों में पदोन्नति की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, सितंबर के पहले माह में अगली डीपीसी आयोजित की जानी है।
यह पदोन्नति तभी संभव हो पा रही है जब कर्मचारियों को प्रोफार्मा पदोन्नति (नो वर्क-नो पे) के आधार पर सितंबर में दूसरा प्रमोशन दिया जाए या फिर 5 साल की अनिवार्यता की शर्त में छूट दी जाए। सरकार इन दोनों में से किसी एक विकल्प को लागू करने पर विचार कर रही है। इसके तहत पिछले 10 सालों (2016 से 2026) से रुकी हुई पदोन्नति की भरपाई प्रोफार्मा प्रमोशन के जरिए की जाएगी। हाल ही में जिन अधिकारी-कर्मचारियों के प्रमोशन हुए हैं, उनकी पदोन्नति के अभी दो महीने ही हुए हैं।
10 साल की सेवा अवधि में कम से कम दो प्रमोशन
इस स्थिति में 5 साल में प्रोफार्मा पदोन्नति का फॉर्मूला विभागों में वरिष्ठता और पदोन्नति का संतुलन बनाए रखने के लिए पांच साल में प्रोफार्मा पदोन्नति दिए जाने पर मुख्य रूप से विचार किया जा रहा है। यदि किसी नियमित पदोन्नति में प्रशासनिक या कानूनी अड़चन आती है, तो कर्मचारी को कागजी (प्रोफार्मा) पदोन्नति का लाभ मिलेगा। इससे 10 साल की कुल सेवा अवधि में कम से कम दो प्रमोशन पदोन्नतियां (प्रोफार्मा सहित) सुनिश्चित करने का खाका तैयार किया जा रहा है। पिछले 10 सालों (2016 से 2026) के दौरान बिना प्रमोशन के रिटायर हुए लगभग 1 लाख अधिकारियों-कर्मचारियों के बारे में फिलहाल कोई अलग से निर्णय नहीं लिया गया है। इस संबंध में कैबिनेट फैसला या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ही संभव हो सकेगा।
यह पहलू भी
सितंबर में होने वाली डीपीसी और जारी होने वाले प्रोफार्मा पदोन्नति आदेश पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगे। 30 अप्रैल 2016 को पदोन्नति नियम 2002 के निरस्त होने के बाद से यह मामला न्यायालय में है। सरकार का रुख साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मान्य करते हुए वर्तमान प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए। सरकार की मंशा यह भी है कि इस साल सितंबर में प्रोफार्मा पदोन्नति प्रक्रिया पूरी करने के बाद अगले साल से फिर नियमित डीपीसी आयोजित की जाए। इससे वरिष्ठता सूची साफ-सुथरी रहेगी और कैडर ब्लॉक होने की समस्या खत्म होगी। बिना किसी पक्षपात के केवल नियम-कायदों और वरिष्ठता सूची के आधार पर ही पदोन्नति के आदेश जारी किए जा सकेंगे।

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