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मुगल शासक औरंगजेब ने 80 खंबा बावडी ने नीचे फिकवाया था इसलिये नाम पड़ा कोटेश्वर महादेव मंदिर, मुगलकालीन शिवालय की देखरेख सिंधिया ट्रस्ट कर रहा है


ग्वालियर. आज सावन का दूसरा सोमवार है। सुबह से ही शहर के प्रमुख शिवालयों पर भक्तों की लम्बी लाइने लगी है। अचलेश्वर, कोटेश्वर, गुप्तेश्वर, भूतेश्वर, चकलेश्वर और धूमेश्वर महादेव मंदिरों पर मेले जैसा वातावरण है। आपको बता दें कि किले की तलहटी में स्थित कोटेश्वर महादेवमंदिर को भक्तों की आस्था का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। श्रावण माह और महाशिवरात्रि पर यहां हजारो की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
कोटेश्वर महादेव मंदिर के बारे में माना जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब का भी इसके आगे झुकना पड़ा था। मंदिर का निर्माण और विकास सिंधिया घराने के शासकों ने कराया था। आज भी इसकी देखरेख सिंधिया ट्रस्ट करता है।
किले पर अस्सी खंबा बावड़ी के पास विराजमान था शिवलिंग
ग्वालियर किले की 80 खंबा बावडी के बगल में स्थापित शिवलिंग को ऐतिहासिक घटना 17वीं सदी की है। ऐसा बताया जाता है कि जब ग्वालियर किला मुगलों के अधीन था। तब औरंगजेब ने शिवलिंग को किले से नीचे फिकवा दिया था और बाद में उसने इसे हटवाने के लिये दोबारा सैनिक भेजे थे। लेकिन अचानक वहां कई नाग प्रकट हो गये और शिवलिंग को घेर लिया और यह देखकर सैनिक वहां भाग गये। ऐसी मान्यता है कि कोटेश्वर महादेव की कृपा से ही ऐसा हुआ है।
वर्षो मलबे में दबा रहा शिवलिंग, पुर्ननिर्माण कराया
कोटेश्वर मंदिर से जुडी इस घटना के बाद शिवलिंग कई वर्षो तक मलबे में दबा रहा। फिर संतदेव महाराज को स्वप्न में नागों द्वारा रक्षित शिवलिंग के दर्शन हुए। उन्हें मूर्ति को बाहर निकालकर पुनः स्थापित करने का आदेश मिला। इसके बाद संत की प्रेरणा से मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ। 18वीं शताब्दी में जयाजीराव सिंधिया ने मंदिर का पुनःनिर्माण करवाया।
ऐसे पड़ मंदिर का नाम कोटेश्वर
म्ंदिर प्रबंधन ने बताया है कि शिवलिंग को किले के एक कोटे (दीवार) से नीचे फेंका गया था। जहां वह गिरा, वहीं स्थान ‘‘कोटेश्वर’’ कहलाया। इसीलिये मंदिर का नाम कोटेश्वर महादेव पड़ा है। आज उस क्षेत्र को कोटेश्वर नगर के नाम से जाना जाता है। वर्तमान पुजारी कृष्णकांत शर्मा ने बताया है कि 1937-38 में सिंधिया रियासत ने विजय प्राप्त की थी। जिसके बाद उसी काल में कोटेश्वर महादेव की प्रतिमा पुनः स्थापित की गयी ।तब से अभी तक यहां प्रतिदिन सुबह मंगला आरती और शाम को सेंध आरती की जाती है। मंदिर की पिंडी (शिवलिंग) थोड़ी तिरछी है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त इस पिंडी पर एक लोटा जल चढ़ाता है उसे ऐसा पुण्य प्राप्त होता है मानो उसने एक हजार शिवलिंगों पर जल चढ़ाया हो।

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