कूनो नेशनल पार्क-पालपुर राजघराना सम्मान के लिये पहुंचा हाईकोर्ट की शरण में, कूनो के लिये छोड़ी थी 222 बीघा जमीन और किला, आज हाईकोर्ट में सुनवाई
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ग्वालियर. मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क की चर्चा इन दिनों देश-दुनिया में है। वजह है भारत में 70 वर्षा के बाद चीतों की आमद यहीं पर हुई है। पीएम नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में नामीबिया से आये 8 चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा है। असल में इसका पूरा नाम पालपुर-कूनो नेशनल पार्क है। 41 वर्ष पहले इस अभ्यारण की नींव रखने वाले पालपुर राजघराने को इस नेशनल पार्क की वजह से ख्याति तो मिली है। लेकिन वह सम्मान नहीं मिला। जिसके वह हकदार थे। अब वह सम्मान और अपना हक वापिस पाने के लिये हाईकोर्ट ग्वालियर की शरण में पहुंचे हैं। आज 29 सितम्बर को इस मामले की सुनवाई होनी है। कलेक्टर को हाईकोर्ट ग्वालियर में अपना पक्ष रखना हैं।
पालपुर राजघराने के वंशज ने कोर्ट में मुआवजा सहित अभ्यारण के अन्दर किला, गढ़ी और मंदिर में जाने की इजाजत और पालपुर की पहचान को यथावत रखने के लिये कोर्ट में याचिका दायर की है। पालपुर राजघराने ने 222 बीघा जमीन और किला अभ्यारण के लिये दिया था।
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राजघराने को क्यों जाना पड़ा हाईकोर्ट
कृष्णराज सिंह पालपुर ने बताया कि जिन शर्तो पर हमारे घराने ने यह जमीन अभ्यारण के लिये दी थी। उन शर्तो का पालन नहीं किया जा रहा है न तो हमें हमारे किले और मंदिर के अन्दर नहीं जाने दिया जा रहा हहै। न ही सरकार ने हमें मुआवजा दिया है और इतना ही नहीं, चीता विस्थापन के कार्यक्रम में एक बार भी हमारे घराने का नाम तक नहीं लिया गया है। इसी सम्मान का ेपाने के लिये हम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं। हमने मुआवजा राशि के अलावा पुश्तैनी किले और मंदिर में आने-जाने की अनुमति देने व नेशनल पार्क का नाम पालपुर नेशनल पार्क ही रहने की मांग की है।
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शेरों के लिये दी थी जमीन आये चीते, वापिस करें सम्पत्ति
अभ्यारण के लिये अपनी 222 बीघा जमीन और किला देने वाले पालपुर राजघराने ने अब अपनी संपत्ति वापिस मांगी है। राजपरिवार के वंशज ने राज्य सरकार के खिलाफ कोर्ट में दायर याचिका में कहा है कि उन्होंने अपनी संपत्ति शेरों के लिये दी थी। अभ्यारण में शेर नहीं आये। अब चीतों को लाया गया, इसलिये उन्हें उनकी संपत्ति वापिस दी जानी चाहिये। राजघराने के लोगों का यह भी कहना है कि उनकी संपत्ति का अवैध तरीके से अधिग्रहण किया गया और कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया है। उन्हें किले के अन्दर स्थित अपने पुश्तैनी मंदिर में पूजा करने तक की इजाजत नहीं है।

किला और मंदिर 1981 में छोड़ा था
कूनो नदी के किनारे स्थित राजघराने का किला पालपुर गढ़ी स्थित अभ्यारण के कोर एरिया में है यह किला नदी के पास पूरे नेशनल पार्क के ठीक बीच में स्थित है। 1981 में पालपुर राजघराने के वंशज स्वर्गीय राजा साहब जगमोहन सिंह पालपुर, जो विजयपुर विधानसभा से 3 बार विधायक एमएलए भी रहे उन्होंने अपने पूर्वजों का सपना पूरा करने अपनी 222 बीघा जमीन वन्य जीव अभ्यारण के लिये दी गयी थी और संेचुरी का उद्घाटन किया था। उस समय शासन ने कई शर्तो के साथ वादे भी किये थे। राजपरिवार ने अपना किला भी खाली कर दिया था। किले के अन्दर ही पुश्तैनी मंदिर और बावड़ी थी। उनसे वादा किया गया था कि वर्ष में होने वाली पूजा करने से उन्हें कभी नहीं रोका जायेगा। हालांकि बाद में उन्हें रोक दिया गया और इसके अलावा अभ्यारण क्षेत्र में आने वाले 24 गांवों को भी खाली कराया गया था।

अपने ही किले और मंदिर में जाने की लेनी पड़ती है इजाजत
पालपुर राजघराने को अपनी संपत्ति के बदले कोई मुआवजा भी नहीं मिला। उन्होंने मुआवजे की मांग की थी, लेकिन पीडब्ल्यूडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि संपत्तियां 100 वर्ष से अधिक पुरानी है और उनकी जीरो वैल्यू है। इस रिपोर्ट के आधार पर मुआवजे की मांग खारिज कर दी गयी। राजपरिवार के लोगों को अभ्यारण के अंदर स्थित अपनी पुश्तैनी जागीर को देखने के लिये आम लोगों की तरह एंट्री लेनी होती है।

