मध्यप्रदेश के नगरीय निकाय चुनाव का मामला-आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका के खिलाफ सरकार जायेगी सुप्रीमकोर्ट
ग्वालियर मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव में आरक्षण को चुनोती देने वाली याचिका के खिलाफ मप्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला लिया है। सोमवार को हाईकोर्ट में सुनवाई के बीच सरकार ने 4 वीक का समय मांगा है। हाईकोर्ट ने 4 वीक का समय देते हुए पूरे मामले का स्टेट्स मांगा हैं और साथ ही मप्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाने के लिये समय दिया गया है। अब देखना होगा कि मप्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को किस तरह से रखती हैं।
आरक्षण प्रक्रिया पर लगाई थी रोक, सरकार ने दिया जबाव
इस मामले में हाईकोर्ट ने मार्च में 2 नगरनिगम, 79 नगरपालिका, नगर पंचायत के आरक्षण की प्रक्रिया पर रोक लगाने के बाद मप्र शासन से जबाव मांगा था। हाईकोर्ट में जबाव पेश करते हुए शासन की ओर से कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 243 और नगरपालिका अधिनियम की धारा 29 में नगरनिगम, नगरपाििलका, नगर पंचायतों के अध्यक्ष चुने जाने हैं। उनके पदो ंके आरक्षण का अधिकार शासन को दिया है।
अनुसूचित जाति और जनजाति के लिये जो पद आरक्षित किये जाते हैं, वह जनगणना के आधार पर तय किये जाते हैं। जनसंख्या के समानुपात के आधार पर आरक्षण किया जाता है। ऐसा नहीं है कि एक पद आरक्षित हो गया है। उसे दोबारा आरक्षित नहीं किया जा सकता। महापौर, नगरपालिका अध्यक्ष व नगरपालिका अध्यक्षों के पद आरक्षित करने में कोई गलती नहीं की है। कानून का पालन करते हुए आरक्षण किया गया है। मप्र सरकार की ओर से पेश की गयी दलील सुनने के बाद याचिकाकर्त्ता मानवर्द्धन सिंह तोमर ने कहा है कि आरक्षण में रोस्टर का पालन नहीं किया गया था।
यह है पूरा मामला
नगरीय निकाय चुनाव मामले में हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में अधिवक्ता मानवर्द्धन सिंह तोमर ने नगर निगम, नगर पालिका व नगर परिषद में अध्यक्ष व अन्य तरह से आरक्षण प्रक्रिया को चुनौती दी थी। इसमें याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी अभिभाषक अभिषेक सिंह भदौरिया द्वारा की गई थी। याचिका पर पहली सुनवाई 10 मार्च 2021 को की गई थी। इसके बाद प्रदेश सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए दो दिन का समय दिया गया था। ग्वालियर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद कहा था कि चूकि प्रथम दृष्ट्या से ऐसा प्रतीत होता है कि 10 दिसंबर 2020 को जारी आरक्षण आदेश में रोटेशन पद्धति का पालन नहीं किया गया है। हाईकोर्ट ने एक अन्य प्रकरण में ऐसा मान्य किया है कि प्रथम दृष्ट्या आरक्षण रोटेशन पद्धति से ही लागू होना चाहिए। ऐसी स्थिति में प्रकरण के अंतिम निराकरण तक उक्त आरक्षण को स्थगित कर दिया गया था।

