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माता रतनगढ़ मेला में सांप का जहर उतारने का अनोखा अंदाज, मंदिर की सीमा में आते ही सर्पदंश वाले हो जाते बेहोश

ग्वालियर. सुबह 10 बजे का समय था। यूपी के निवासी 4 लोग राधेलाल का उठाकर पहाड़ पर चढ़ रहे थे वह बीच-बीच में माता के जयकारे लगा रहे थे। लगभग आधा किमी चढ़ाई के बाद मंदिर पहुंचे। यहां पर लाइन लगी हुई थी। कुछ लोग ऊपर खड़े होकर नीम के पत्तों को हाथों में लिये लोगों के सिर पर फेर रहे थे। यह कोई और नहीं मंदिर के पुजारी थे, जो सांपके डंसने वालों को झाड़ रहे थे। जिन्हिें सांप नपे डंसा था। ऐसे लाखों लोग शनिवार को रतनगढ़ माता मंदिर पर दौज लख्खी मेले में शामिल हुए। लगभग 15 लाख श्रद्धालुओं ने माता मंदिर पहुंचकर दर्शन किये और अपनी मन्नतें पूरी की।
श्रद्धालु राधेलाल ने बताया िकवह उत्तरप्रदेश से मंदिर के दर्शन के लिये यहां आये हैं। उन्हें 4 माह पूर्व सांप ने डंसा था। तब माता के नाम से बंधन बंधवाया था। बंधन उतारने दीपावली की दूज पर माता रतनगढ़ मंदिर पहुंचे थे। कुंवर महाराज के दर्शन किये। अब हम पूरी तरह से ठीक हैं। वहीं, रामवती ने बताया कि एक साल पहले घर पर काम करते समय सांप ने डंस लिया था। तब माता के नाम की भभूति लगाई थी। जिस वजह से जहर का असर नहीं हुआ था। शनिवार को कुंवर महाराज के दर्शन किये।

इस प्रकार से लेकर मंदिर पहुंचे परिवार वाले।

ऐसी है मान्यता
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार सांप या जहरीले जीव-जंतु के काट लेने पर देवी रतनगढ़ माता के नाम का बंद बांध दिए जाने से जहर का असर नहीं होता। बंद बांधने के बाद उस व्यक्ति को भाई दूज के दिन देवी रतनगढ़ एवं कुंवर बाबा के मंदिर में आना होता है। सर्पदंश से पीड़ित मंदिर में आते ही अपने उस पुरानी स्थिति में आ जाते हैं, जब उन्हें सांप ने डंसा था। उस समय वह अचेत हो जाता है। मंदिर में मौजूद पुजारी माता के जयकारे लगाते हुए नीम की टहनी से जैसे ही श्रद्धालु पर स्पर्श करते हैं। वह पूरी तरह से स्वस्थ होकर माता का जयकारा लगाते हुए अपने घर रवाना हो जाता है।रतनगढ़ मंदिर पीठ के महंत पंडित राजेश कटारे ने बताया कि मंदिर पर स्वभाविक रूप से जो श्रद्धालु हर साल यहां आते हैं। उतनी संख्या से ज्यादा श्रद्धालु इस बार आए हैं। उनकी आस्था और विश्वास में कोई कमी नहीं आई है। मंदिर परिक्षेत्र में ही हॉस्पिटल सहित अन्य सुविधाएं दी प्रशासन ने मुहैया कराई थी।

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